नई दिल्ली, (वेब वार्ता)। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने शुक्रवार को बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आलोक अराधे और पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विपुल मनुभाई पंचोली को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई।
दोनों न्यायाधीशों के पदोन्नति की अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने 25 अगस्त को की थी, जिसे केंद्र सरकार ने शीघ्र ही मंजूरी दे दी थी। यह नियुक्तियां न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला के सेवानिवृत्त होने के बाद खाली हुई जगह को भरती हैं।
न्यायमूर्ति विपुल पंचोली: भविष्य के CJI के रूप में कार्यभार संभालेंगे
इस नियुक्ति के साथ ही, न्यायमूर्ति विपुल पंचोली भारत के भावी प्रधान न्यायाधीश बनने की राह पर चल पड़े हैं। निर्धारित वरिष्ठता क्रम के अनुसार, उनके 3 अक्टूबर, 2031 को देश के 39वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में पदभार संभालने का अनुमान है। वह इस पद पर 27 मई, 2033 तक कार्यरत रहेंगे, जिस दिन वह सेवानिवृत्त होंगे।
यह पदोन्नति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारत के न्यायिक इतिहास में एक और अध्याय जुड़ेगा।
कॉलेजियम में दर्ज हुई थी कड़ी असहमति
हालांकि, इस नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के भीतर से भी एक कड़ी असहमति सामने आई थी। कॉलेजियम की सदस्य और सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने न्यायमूर्ति पंचोली की पदोन्नति की अनुशंसा पर अपना विरोध दर्ज कराया था।
उन्होंने अपने असहमति नोट में कहा था कि न्यायमूर्ति पंचोली की नियुक्ति “न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए प्रतिकूल” होगी और यह “न्यायिक संस्थानों के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर सकती है।” उनकी इस आपत्ति के बावजूद, कॉलेजियम के बहुमत ने पदोन्नति की अनुशंसा को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच को मिला नया बल
दोनों नए न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण के साथ, सुप्रीम कोर्ट की बेंच को ताजा बल मिला है। न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली, दोनों ही अपने-अपने उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान प्रशंसित रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि शीर्ष अदालत में उनका अनुभव न्यायिक प्रक्रिया को और समृद्ध करेगा।