नई दिल्ली, नेशनल डेस्क | वेब वार्ता
Supreme Court English Exam Remark: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प लेकिन सख्त टिप्पणी सामने आई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि यदि उसने खुद इतनी जटिल अंग्रेज़ी में याचिका लिखी है, तो अदालत में ही उसका अंग्रेज़ी टेस्ट लिया जा सकता है। CJI ने कहा, “अगर आपने खुद याचिका लिखी है तो यहीं अंग्रेज़ी का टेस्ट दे दो, 30 नंबर लाकर दिखाओ।”
दरअसल अदालत को उस समय संदेह हुआ जब याचिकाकर्ता अपने ही आवेदन में लिखे गए कई कानूनी बिंदुओं को स्पष्ट रूप से समझाने में असमर्थ रहा। इस Supreme Court English Exam Remark के बाद अदालत ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की।
⚡ संक्षिप्त वार्ता (News Summary)
- सुप्रीम कोर्ट में PIL सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की टिप्पणी
- सुप्रीम कोर्ट इंग्लिश टेस्ट टिप्पणी के दौरान याचिकाकर्ता से अंग्रेज़ी पर सवाल
- कोर्ट ने कहा – अगर खुद लिखा है तो यहीं टेस्ट दे दो
- 30 नंबर लाने पर याचिका पर विचार करने की टिप्पणी
[Supreme Court hears a PIL]
CJI Surya Kant: Have you drafted the plea?
Petitioner: Yes myself. I can deposit my phone here.
CJI: What is your background ?
Petitioner: 12th pass
CJI: which school?
Petitioner: Sanatan Dharm school, Ludhiana
CJI: I will arrange an English… pic.twitter.com/hPVnXkIHlK
— Bar and Bench (@barandbench) March 10, 2026
सुनवाई के दौरान क्या हुआ
मामला उस समय सामने आया जब एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि याचिका में इस्तेमाल किए गए कुछ जटिल कानूनी शब्दों और दलीलों का क्या अर्थ है।
लेकिन याचिकाकर्ता इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाया। इससे अदालत को संदेह हुआ कि संभवतः याचिका किसी और ने तैयार की है और याचिकाकर्ता को उसकी सामग्री की पूरी जानकारी नहीं है।
इसी दौरान अदालत ने Supreme Court English Exam Remark करते हुए कहा कि अगर याचिका वास्तव में याचिकाकर्ता ने ही लिखी है तो अदालत में ही उसकी अंग्रेज़ी की परीक्षा ली जा सकती है।
[सुप्रीम कोर्ट में PIL की सुनवाई]
CJI सूर्यकांत: क्या आपने यह याचिका खुद तैयार की है?
याचिकाकर्ता: जी हां, मैंने ही बनाई है। आप चाहें तो मेरा फोन यहां जमा करा सकते हैं।
CJI: आपका शैक्षणिक बैकग्राउंड क्या है?
याचिकाकर्ता: मैं 12वीं पास हूं।
CJI: किस स्कूल से पढ़ाई की?
याचिकाकर्ता: सनातन धर्म स्कूल, लुधियाना।
CJI: अगर आपने खुद यह याचिका लिखी है तो यहीं अदालत में आपका अंग्रेज़ी का टेस्ट करवा देते हैं। 30 नंबर लाकर दिखाइए, फिर हम याचिका पर विचार करेंगे।
याचिकाकर्ता: जी, मैं दे सकता हूं।
CJI: सच बताइए, वरना हमें भारी जुर्माना लगाना पड़ेगा और जांच का आदेश देना पड़ेगा।
याचिकाकर्ता: आप मेरा फोन देख सकते हैं।
CJI: आपने याचिका में लिखा है — “fiduciary risk to corporate donors”। इसका मतलब क्या है?
वकील: मैं याचिका का संदर्भ दे सकता हूं।
CJI: मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं — यह याचिका किस वकील ने तैयार की है? आपने इसे खुद नहीं लिखा है।
वकील: मैंने AI टूल्स से खोज की थी। एक टाइपिस्ट को चार जैकेट दी थीं और उसने टाइपिंग के लिए प्रति घंटे 1000 रुपये लिए थे।
CJI: सुप्रीम कोर्ट का टाइपिस्ट याचिका तैयार कर रहा है? उसे यहां बुलाइए।
फालतू PIL पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार इस बात पर चिंता जता चुका है कि कई लोग पब्लिसिटी या निजी हित के लिए जनहित याचिकाएँ दाखिल कर देते हैं। ऐसी याचिकाओं से न्यायालय की कार्यवाही प्रभावित होती है और महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई में देरी हो सकती है।
इस मामले में भी अदालत ने कहा कि बिना समझे इस तरह की याचिकाएँ दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत का समय बेहद कीमती है और उसे केवल गंभीर मामलों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिका की भाषा काफी जटिल है। जब न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ता से उसमें लिखे गए बिंदुओं के बारे में पूछा तो वह उन्हें स्पष्ट रूप से समझा नहीं सका। इसी के बाद Supreme Court English Exam Remark सामने आया।
कोर्ट ने दी सख्त चेतावनी
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को चेतावनी देते हुए कहा कि भविष्य में इस तरह की याचिकाएँ दाखिल करने से पहले पूरी तैयारी और समझ होना जरूरी है। अन्यथा अदालत जुर्माना लगाने या याचिका खारिज करने जैसी कार्रवाई भी कर सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि Supreme Court English Exam Remark यह संकेत देता है कि अदालत अब निराधार या बिना तैयारी वाली याचिकाओं को लेकर अधिक सख्त रुख अपना रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार जनहित याचिका एक गंभीर संवैधानिक व्यवस्था है और इसका उपयोग केवल वास्तविक सार्वजनिक हित के मामलों में ही किया जाना चाहिए।







