लखनऊ, अजय कुमार | वेब वार्ता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित कार्यकर्ता कुटुम्ब मिलन कार्यक्रम में कहा कि मंदिर, कुआं और श्मशान सभी हिन्दुओं के लिए समान रूप से खुले होने चाहिए और समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यह विचार निराला नगर स्थित सरस्वती विद्या मन्दिर के माधव सभागार में व्यक्त करते हुए सामाजिक समरसता और पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया।
करियर का अर्थ केवल कमाना नहीं: भागवत
डॉ. भागवत ने कहा कि बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि करियर केवल पैसा कमाना या उपभोग करना नहीं है।
उन्होंने कहा कि सच्चा करियर दूसरों के लिए जीने, समाज को देने और देश के लिए काम करने में है।
संघ पूरे हिन्दू समाज को एक मानता है
सरसंघचालक ने कहा कि संघ सारे हिन्दू समाज को एक परिवार मानता है और जाति-पाति से ऊपर उठकर सामाजिक एकता पर कार्य करता है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता केवल भाषणों से नहीं, व्यवहार से आती है।
समाज की मूल इकाई परिवार है
डॉ. भागवत ने कहा कि समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति नहीं, बल्कि परिवार है।
परिवार में ही बच्चों को देशभक्ति, अनुशासन, प्रमाणिकता और कुटुम्ब गौरव के संस्कार मिलते हैं।
मातृभाषा और संस्कारों पर जोर
उन्होंने कहा कि बच्चों को मातृभाषा का समुचित ज्ञान होना चाहिए और घरों में अच्छे संस्कार दिए जाने चाहिए।
विद्या और धन का उपयोग देश और समाज के हित में होना चाहिए।
बस्ती और शाखा स्तर पर कुटुम्ब मिलन
सरसंघचालक ने कहा कि बस्ती और शाखा स्तर पर नियमित कुटुम्ब मिलन कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए।
इससे समाज में आपसी मेलजोल और विश्वास बढ़ता है।
हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है
अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है और सभी हिन्दू आपस में सहोदर हैं।
उन्होंने संघ कार्यकर्ताओं से समाज के हर वर्ग से आत्मीय संबंध स्थापित करने का आह्वान किया।
तकनीक के सीमित और अनुशासित उपयोग की सलाह
डॉ. भागवत ने कहा कि तकनीक को रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसका अनुशासित उपयोग जरूरी है।
उन्होंने एआई, मोबाइल, टीवी और फिल्मों के दुष्प्रभावों से युवाओं को जागरूक करने पर बल दिया।
संघ एक चिरतरुण संगठन
सरसंघचालक ने कहा कि संघ एक चिरतरुण संगठन है और देश के सबसे अधिक युवा इससे जुड़े हैं।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
निष्कर्ष
डॉ. मोहन भागवत के विचार सामाजिक एकता, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का संदेश देते हैं।
उन्होंने समाज को भेदभाव से मुक्त, संस्कारित और संगठित बनाने की दिशा में सामूहिक प्रयास का आह्वान किया।
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