मुंबई, नेशनल वार्ता | वेब वार्ता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि “हिंदू” कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक विशेषण है, जो भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान को दर्शाता है। मुंबई में आयोजित संघ के शताब्दी समारोह में उन्होंने कहा कि भारत के सभी नागरिक, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, एक ही वंश और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े हैं।
शताब्दी समारोह में ऐतिहासिक संबोधन
हिंदू संज्ञा नहीं, विशेषण है….भारत में रहने वाले सभी हिन्दू ही हैं। – डा. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ #RSS100Years #RSS100 pic.twitter.com/wntM8QPjxE
— RSS (@RSSorg) February 7, 2026
मुंबई के एक प्रमुख सभागार में आयोजित आरएसएस के शताब्दी वर्ष समारोह के दौरान मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों और अतिथियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, “हिंदू एक संज्ञा नहीं, बल्कि एक विशेषण है, जो भारत की सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करता है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि “हिंदू” शब्द को किसी पर थोपी गई पहचान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह उन सभी लोगों का प्रतीक है, जो इस भूमि, इसकी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े हैं।
संस्कृति और सभ्यता की साझा विरासत
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत की सभ्यता हजारों वर्षों से विविधता में एकता का उदाहरण रही है। धर्म भले अलग हों, लेकिन सांस्कृतिक जड़ें एक ही हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे इस विरासत को संरक्षित करें और समाज में समरसता बनाए रखें।
भागवत ने कहा कि हिंदू होना केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि भूमि पर गर्व, संस्कृति की सराहना और पूर्वजों की गौरव गाथा से जुड़ाव का प्रतीक है।
आरएसएस के 100 वर्षों की यात्रा
अपने संबोधन में उन्होंने संघ के सौ वर्षों के सफर का उल्लेख करते हुए कहा कि आरएसएस का मूल उद्देश्य हमेशा से राष्ट्र निर्माण रहा है। शताब्दी वर्ष हमें नई ऊर्जा और नई जिम्मेदारी देता है, जिससे समावेशी और मजबूत समाज का निर्माण किया जा सके।
- सांस्कृतिक एकता: सभी भारतीयों की साझा पहचान पर जोर
- युवा आह्वान: विरासत के संरक्षण की अपील
- राष्ट्र निर्माण: आरएसएस के मूल उद्देश्य की पुनः पुष्टि
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
मोहन भागवत के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। कुछ वर्गों ने इसे सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश बताया, जबकि अन्य ने इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नई व्याख्या के रूप में देखा।
सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह बयान वर्तमान समय में बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच एक सकारात्मक और संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
“हिंदू” को विशेषण बताकर मोहन भागवत ने सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय समरसता का स्पष्ट संदेश दिया है। आरएसएस के शताब्दी वर्ष में दिया गया यह बयान देश में पहचान, संस्कृति और सह-अस्तित्व पर नए सिरे से विमर्श को दिशा दे सकता है।
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