लखनऊ, संवाददाता | वेब वार्ता
लखनऊ में संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक समरसता ही समाज में एकता का आधार है। उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज दुनिया का सबसे पंथनिरपेक्ष समाज है।
डॉ. भागवत ने कहा कि अनेक जाति और संप्रदाय की पहचान से ऊपर उठकर सभी को स्वयं को हिन्दू मानने का भाव विकसित करना चाहिए।
जाति व्यवस्था को समाप्त करने पर दिया जोर
सरसंघचालक ने कहा कि जाति और भाषा की पहचान से अधिक महत्वपूर्ण सामूहिक एकता की भावना है।
उन्होंने कहा कि संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती और सभी को हिन्दू सहोदर मानकर कार्य किया जाता है।
उन्होंने कहा कि जब समाज में जाति-पाति को महत्व मिलना बंद होगा, तब जाति आधारित राजनीति भी स्वतः समाप्त हो जाएगी।
परिवार व्यवस्था और संस्कारों पर जोर
डॉ. भागवत ने संयुक्त परिवार व्यवस्था को समाज की मजबूती का आधार बताते हुए कहा कि परिवारों को वर्ष में कम से कम एक बार एकत्रित होकर परंपराओं का निर्वहन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता अपनाना आवश्यक है, लेकिन पश्चिमीकरण का अंधानुकरण नहीं होना चाहिए। घर में ही बच्चों को धर्म और संस्कारों की शिक्षा दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि संयुक्त परिवारों में संस्कारों का संरक्षण होता है और अच्छे परिवार से ही अच्छे समाज का निर्माण होता है।
मंदिरों के नियंत्रण पर रखी राय
मंदिरों के सरकारी नियंत्रण से मुक्ति के विषय पर डॉ. भागवत ने कहा कि मंदिरों का संचालन भक्तों, धर्माचार्यों और सज्जन लोगों के हाथों में होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मंदिरों की आय का उपयोग राष्ट्रहित और हिन्दू कल्याण के लिए किया जाना चाहिए। इस दिशा में विश्व हिन्दू परिषद कार्य कर रहा है।
ग्राम विकास और संघ की भूमिका
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ व्यक्ति निर्माण के साथ-साथ ग्राम विकास का भी कार्य कर रहा है। देशभर में पांच हजार गांवों को विकास के लिए चयनित किया गया है।
इनमें से 333 गांवों में शिक्षा, रोजगार और भूमि वितरण जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं, जिससे ग्रामीण जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है।
भारत की वैश्विक भूमिका पर विचार
एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि भारत भविष्य में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करेगा।
उन्होंने कहा कि टैरिफ वार से भारत को नुकसान नहीं होगा और देश किसी भी दबाव के सामने झुकेगा नहीं।
उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था जनता की शक्ति पर आधारित है, जो देश को आत्मनिर्भर बनाती है।
सामाजिक कार्यों से जुड़ने का आह्वान
डॉ. भागवत ने सज्जन शक्ति से अपील की कि वे समाज परिवर्तन के किसी न किसी प्रकल्प से जुड़ें।
उन्होंने कहा कि संघ को समझने के लिए शाखाओं और कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए, और यदि यह संभव न हो तो किसी सामाजिक गतिविधि से अवश्य जुड़ना चाहिए।
निष्कर्ष
संघ शताब्दी वर्ष की जन गोष्ठी में डॉ. मोहन भागवत के विचारों ने सामाजिक एकता, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक स्पष्ट संदेश दिया है।
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