कांवड़ यात्रा: न्यायालय ने भोजनालयों के लिए क्यूआर कोड संबंधी निर्देश पर रोक लगाने से इनकार किया

नई दिल्ली, (वेब वार्ता)। उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों के लिए ‘क्यूआर’ कोड संबंधी निर्देश पर रोक लगाने से मंगलवार को इनकार कर दिया और इस मार्ग पर मौजूद सभी होटल मालिकों को निर्देश दिया कि वे वैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप अपने लाइसेंस एवं पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करें।

न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि वह होटल या ढाबा मालिक का नाम और क्यूआर कोड प्रदर्शित करने के अन्य मुद्दों पर विचार नहीं कर रही, क्योंकि मंगलवार को कांवड़ यात्रा का अंतिम दिन है।

पीठ ने कहा, ”हमें बताया गया है कि यात्रा का आज अंतिम दिन है… इसलिए इस स्तर पर हम केवल यह आदेश पारित कर सकते हैं कि सभी संबंधित होटल मालिक वैधानिक आवश्यकताओं के अनुसार लाइसेंस और पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदर्शित करने के निर्देश का पालन करेंगे।”

शीर्ष अदालत ने शिक्षाविद अपूर्वानंद झा और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक एम. सिंघवी ने दलील दी कि उत्तर प्रदेश सरकार को क्यूआर कोड संबंधी निर्देश जारी करने से पहले न्यायालय के 2024 के आदेश में संशोधन का अनुरोध करना चाहिए था।

सिंघवी ने कहा, ”यात्रा के दौरान लोगों को बहिष्कृत करने की यह सबसे विभाजनकारी पहल है, मानो ये लोग अछूत हों। क्या ‘मेनू कार्ड’ (व्यंजन के विकल्पों की सूची) के बजाय मेरा उपनाम यह सुनिश्चित करेगा कि ‘कांवड़ियों’ को अच्छी गुणवत्ता वाला भोजन मिलेगा या नहीं?”

वरिष्ठ वकील ने कुछ दुकानों पर कांवड़ियों के कथित हमलों से जुड़ी खबरों का हवाला देते हुए कहा, ”जब आप विभाजन के बीज बोते हैं, तो बाकी चीजों का ध्यान जनता खुद रख लेती है।”

उनके तर्क का जवाब देते हुए न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि लोगों के खान-पान के विकल्प अलग-अलग होते हैं और कोई शाकाहारी व्यक्ति, खासकर धार्मिक यात्रा के दौरान केवल शाकाहारी भोजन परोसने वाली जगह पर ही जाने का विकल्प चुनना चाहेगा।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि ये निर्देश भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के नियमों के अनुरूप जारी किए गए हैं।

रोहतगी ने कहा, ”इस देश में ऐसे भी लोग हैं, जिनके भाई के घर में अगर मांस पकाया जाता है, तो वे वहां भी खाना नहीं खाते। भक्तों की भावनाएं होती हैं और अधिनियम के नियमों के अनुसार उन्हें फोटो पहचान पत्र की आवश्यकता होती है। आप अपना नाम दिखाने से क्यों डरते हैं? मुझे समझ नहीं आ रहा।”

अन्य याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि स्थानीय नियमों के अनुसार इस मार्ग पर स्थित भोजनालयों में इस अवधि के दौरान केवल शाकाहारी व्यंजन ही बेचे जाते हैं।

न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा, ”अगर कोई होटल शुरू से ही शाकाहारी भोजन परोस रहा है तो नाम और अन्य चीजों का उल्लेख करने का सवाल ही नहीं उठता, लेकिन अगर केवल यात्रा के उद्देश्य से कोई मांसाहारी खाना परोसना बंद कर देता है और शाकाहारी भोजन बेचना शुरू कर देता है, तो उपभोक्ता को इसका पता होना चाहिए।”

न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा, ”उपभोक्ताओं को यह लचीलापन मिलना चाहिए। अगर कोई होटल पहले मांसाहारी खाना परोसता था और बेहतर व्यवसाय के उद्देश्य से वह यात्रा के दौरान केवल शाकाहारी खाना परोसता है, तो यह उपभोक्ता के लिए विचार का विषय होगा। चयन उपभोक्ता को करना है। यहां उपभोक्ता ही राजा है।”

न्यायालय ने पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश सरकारों द्वारा जारी इसी तरह के निर्देशों पर रोक लगा दी थी, जिनमें कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित भोजनालयों को अपने मालिकों, कर्मचारियों और अन्य विवरणों के नाम प्रदर्शित करने को कहा गया था।

झा ने उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा 25 जून को जारी की गई एक प्रेस विज्ञप्ति का हवाला देते हुए कहा, ”नए उपायों में कांवड़ मार्ग पर स्थित सभी भोजनालयों के लिए क्यूआर कोड प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया है, ताकि मालिकों के नाम और पहचान का पता चल सके, लेकिन इस तरह की भेदभावपूर्ण नीति पर न्यायालय पहले ही रोक लगा चुका है।”

याचिका में आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार का निर्देश दुकान, ढाबा और रेस्तरां मालिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

हिंदू कैलेंडर के ‘श्रावण’ माह में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगाजल लेकर विभिन्न स्थानों से कांवड़ लेकर आते हैं। अनेक श्रद्धालु इस महीने में मांसाहार से परहेज करते हैं और अनेक लोग प्याज तथा लहसुन युक्त भोजन भी नहीं खाते।

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