वॉशिंगटन, अंतरराष्ट्रीय डेस्क | वेब वार्ता
अमेरिका की विदेश नीति को लेकर एक बार फिर तीखी बहस शुरू हो गई है। राष्ट्रपति :contentReference[oaicite:0]{index=0} के दूसरे कार्यकाल के पहले साल में अमेरिकी सेना ने विदेशों की धरती पर जितने हवाई और ड्रोन हमले किए, उतने हमले पूर्व राष्ट्रपति :contentReference[oaicite:1]{index=1} के पूरे चार साल के कार्यकाल में भी नहीं हुए थे। एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे और संघर्ष निगरानी संस्था के आंकड़ों ने ट्रंप प्रशासन की सैन्य रणनीति को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है।
ACLED के आंकड़े क्या कहते हैं?
आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट (:contentReference[oaicite:2]{index=2}) के अनुसार, 20 जनवरी 2025 से 5 जनवरी 2026 के बीच अमेरिका ने अकेले 573 हवाई और ड्रोन हमले किए। अगर इसमें अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ किए गए संयुक्त ऑपरेशंस को जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या बढ़कर 658 तक पहुंच जाती है।
बाइडेन के चार साल बनाम ट्रंप का एक साल
आंकड़ों की तुलना करें तो जो बाइडेन के पूरे चार साल के कार्यकाल में अमेरिका ने कुल 494 हवाई और ड्रोन हमले किए थे, जबकि गठबंधन साझेदारों के साथ मिलकर 694 सैन्य ऑपरेशन हुए थे। इसके मुकाबले ट्रंप ने महज एक साल में ही हमलों की संख्या के मामले में बाइडेन सरकार को पीछे छोड़ दिया है।
- ट्रंप (1 साल): 573 अमेरिकी हमले, 658 कुल ऑपरेशन
- बाइडेन (4 साल): 494 अमेरिकी हमले, 694 गठबंधन ऑपरेशन
- ट्रंप काल में 9 से अधिक देशों में सैन्य कार्रवाई
एक साल में 1,093 मौतें
नॉन-प्रॉफिट कॉन्फ्लिक्ट वॉचडॉग की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले 12 महीनों में अमेरिका कम से कम 9 देशों में 1,008 विदेशी सैन्य अभियानों में शामिल रहा। इन अभियानों में लगभग 1,093 लोगों की मौत हुई। वहीं, बाइडेन के पूरे कार्यकाल में 1,648 अभियानों के दौरान 1,518 मौतें दर्ज की गई थीं।
किन इलाकों में सबसे ज्यादा हमले?
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में जनवरी से दिसंबर के बीच 80 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी हमले यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ किए गए। इन हमलों में 530 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। इसके अलावा कैरेबियन सागर और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में ड्रग तस्करी के खिलाफ चलाए गए अभियानों में भी बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
‘पहले हमला, बाद में सवाल’ की रणनीति?
ACLED के विश्लेषण में कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन की सैन्य नीति ‘पहले हमला करो, बाद में सवाल पूछो’ जैसी दिखाई देती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ट्रंप सरकार ने तेज, हाई-इम्पैक्ट सैन्य कार्रवाई को प्राथमिक प्रतिक्रिया के तौर पर अपनाया है, जो पहले की सरकारों की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक और कम रुकावटों वाली है।
ACLED CEO की चेतावनी
ACLED के सीईओ क्लियोनाड रैले ने ट्रंप प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अमेरिका की मौजूदा विदेशी सैन्य गतिविधियां न सिर्फ अपनी रफ्तार के कारण चौंकाने वाली हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत शक्ति को नियंत्रित करने की अवधारणा को खुली चुनौती दे रही हैं। उन्होंने चेताया कि आने वाले समय में ग्रीनलैंड, कोलंबिया और क्यूबा जैसे क्षेत्रों पर भी अमेरिका का ध्यान केंद्रित हो सकता है।
निष्कर्ष: बदली अमेरिकी सैन्य नीति?
आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी विदेश नीति पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक हो गई है। जहां बाइडेन प्रशासन को अपेक्षाकृत संतुलित रणनीति के लिए जाना गया, वहीं ट्रंप सरकार तेजी से सैन्य कार्रवाई को प्राथमिक विकल्प बना रही है। इससे वैश्विक राजनीति में तनाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
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