Sunday, January 25, 2026
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ब्रेकिंग विश्लेषण: बांग्लादेश चुनाव से पहले ‘जमात’ पर अमेरिका की नजर, क्यों बढ़ी भारत की टेंशन?

ढाका/नई दिल्ली, इंटरनेशनल डेस्क | वेब वार्ता

बांग्लादेश में फरवरी में होने वाले आम चुनाव से पहले राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता छोड़ने और देश से बाहर जाने के करीब डेढ़ साल बाद चुनावी मैदान पूरी तरह नया नजर आ रहा है। अवामी लीग पर प्रतिबंध के बीच इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के मजबूत प्रदर्शन की अटकलें हैं। इसी बीच अमेरिका द्वारा जमात के साथ संपर्क बढ़ाने की खबरों ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को और गहरा कर दिया है।

अमेरिका-जमात संपर्क: संकेत क्या कहते हैं?

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राजनयिकों ने संकेत दिए हैं कि वे बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के साथ संवाद और सहयोग के लिए तैयार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में 1 दिसंबर को महिला पत्रकारों के साथ हुई एक बंद कमरे की बैठक में एक अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि बांग्लादेश की राजनीति इस्लामिक दिशा की ओर शिफ्ट हो चुकी है और जमात 12 फरवरी के चुनाव में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती है।

ऑडियो रिकॉर्डिंग के हवाले से कहा गया कि राजनयिक ने यहां तक कहा—“हम चाहते हैं कि वे हमारे मित्र बनें”—और पत्रकारों से पार्टी की छात्र शाखा के सदस्यों को कार्यक्रमों में आमंत्रित करने पर विचार करने को भी कहा।

शरिया कानून की आशंका पर अमेरिकी प्रतिक्रिया

अमेरिकी राजनयिक ने इस आशंका को भी कमतर बताया कि जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आने पर शरिया कानून लागू कर सकती है। उनका कहना था कि यदि ऐसा हुआ, तो अमेरिका अगले ही दिन 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने जैसे कठोर कदम उठा सकता है।

हालांकि, ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शाई ने स्पष्ट किया कि यह बातचीत एक “रूटीन और ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा” थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका किसी एक पार्टी का समर्थन नहीं करता और वह उसी सरकार के साथ काम करेगा, जिसे बांग्लादेश की जनता चुनेगी।

जमात-ए-इस्लामी का विवादित इतिहास

जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में इस्लामी विचारक सैयद अबुल आला मौदूदी ने की थी। पार्टी ने बांग्लादेश की पाकिस्तान से आज़ादी का विरोध किया था। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जमात के कई नेताओं पर पाकिस्तानी सेना का साथ देने और आज़ादी समर्थक नागरिकों के खिलाफ हिंसा में शामिल होने के आरोप लगे।

2009 में सत्ता में लौटने के बाद शेख हसीना ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के जरिए जमात नेताओं पर युद्ध अपराधों के मुकदमे चलवाए और पार्टी पर प्रतिबंध लगाया। इसके बाद जमात लंबे समय तक राजनीतिक रूप से हाशिये पर रही।

2024 के बाद बदली सियासी तस्वीर

2024 के छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना के सत्ता से हटने के साथ ही जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया। इसके बाद पार्टी ने तेजी से खुद को संगठित किया। शफीकुर रहमान, मिया गोलाम परवर और सैयद अब्दुल्ला मोहम्मद ताहेर के नेतृत्व में जमात ने अपना जनाधार बढ़ाया है।

परंपरागत रूप से शरिया आधारित शासन और महिलाओं के कार्य समय को सीमित करने की वकालत करने वाली पार्टी ने हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे और नरम छवि पर जोर दिया है। पार्टी ने छात्र आंदोलन से उभरी नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के साथ गठबंधन भी किया है, हालांकि इसे लेकर NCP के भीतर मतभेद सामने आए हैं।

भारत की बढ़ती चिंता: क्यों अहम है यह बदलाव?

अमेरिका का जमात के प्रति झुकाव भारत के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। भारत ने 2019 में कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी को गैरकानूनी संगठन घोषित किया था और 2024 में इस प्रतिबंध को आगे बढ़ाया। ऐसे में बांग्लादेश में जमात की संभावित सत्ता भारत-बांग्लादेश संबंधों को जटिल बना सकती है।

  • भारत-बांग्लादेश सुरक्षा सहयोग पर असर की आशंका
  • सीमा, कट्टरपंथ और अल्पसंख्यक मुद्दों पर तनाव
  • घरेलू राजनीति के कारण तालमेल में कठिनाई

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के थॉमस कीन के अनुसार, यदि जमात सत्ता में आती है, तो भारत-बांग्लादेश रिश्तों को दोबारा पटरी पर लाना और मुश्किल हो सकता है।

भारत-अमेरिका रिश्तों पर भी पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि जमात को लेकर अमेरिका का रुख भारत-अमेरिका संबंधों में भी तनाव ला सकता है, जो पहले ही अमेरिकी टैरिफ, भारत-पाकिस्तान तनाव और रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दों पर दबाव में हैं।

12 फरवरी को होगा फैसला

12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव में मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच होने की संभावना है। जमात ने संकेत दिए हैं कि जरूरत पड़ने पर वह BNP के साथ मिलकर सरकार बनाने को तैयार है।

कुल मिलाकर, बांग्लादेश का यह चुनाव न केवल देश की आंतरिक राजनीति, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति के लिए भी बेहद अहम साबित हो सकता है।

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