नई दिल्ली, डेस्क | वेब वार्ता
संजय दत्त की फिल्म ‘केडी: द डेविल’ के गाने ‘सरके चुनर’ पर विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। लोकसभा सत्र के दौरान यह मुद्दा उठने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।
लोकसभा में उठा मुद्दा, मंत्री ने दी जानकारी
समाजवादी पार्टी के सांसद आनंद भदौरिया ने लोकसभा में इस गाने को लेकर सवाल उठाया, जिसके जवाब में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि गाने को पहले ही बैन किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन इसे समाज और संस्कृति के दायरे में रहकर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
विवाद की वजह: लिरिक्स पर उठे सवाल
इस गाने को लेकर मुख्य विवाद इसके लिरिक्स को लेकर सामने आया है। नोरा फतेही पर फिल्माए गए इस गाने के कुछ शब्दों को सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और अश्लील बताया गया, जिसके बाद यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया।
- सोशल मीडिया पर लिरिक्स को लेकर विरोध
- गाने को प्लेटफॉर्म्स से हटाया गया
- संस्कृति और अभिव्यक्ति की बहस तेज
सरकार का फैसला और कार्रवाई
| मुद्दा | कार्रवाई |
|---|---|
| विवादित लिरिक्स | गाने पर पूर्ण प्रतिबंध |
| सोशल मीडिया | सभी प्लेटफॉर्म से हटाया गया |
| संसदीय चर्चा | लोकसभा में मुद्दा उठा |
सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कंटेंट को सार्वजनिक करने से पहले सामाजिक जिम्मेदारी का ध्यान रखना जरूरी है। इसी के तहत गाने को तत्काल प्रभाव से हटाने का निर्णय लिया गया।
लिरिक्स राइटर ने मांगी माफी
विवाद बढ़ने के बाद गाने के लिरिक्स राइटर रकीब आलम ने सोशल मीडिया पर माफी मांगते हुए कहा कि मूल लिरिक्स उन्होंने नहीं लिखे थे। उनके अनुसार, यह गाना कन्नड़ भाषा से हिंदी में अनुवादित किया गया था और यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वे इसके लिए खेद व्यक्त करते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर फिर छिड़ी बहस
इस पूरे मामले के बाद एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मर्यादा को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर जहां कुछ लोग इसे सेंसरशिप का मामला बता रहे हैं, वहीं कई लोग सरकार के फैसले को सही ठहरा रहे हैं।
निष्कर्ष
‘सरके चुनर’ गाने पर लगा प्रतिबंध यह दर्शाता है कि डिजिटल युग में कंटेंट की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का संतुलन बनाए रखना अब जरूरी हो गया है।
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