मुंबई, एंटरटेनमेंट डेस्क | वेब वार्ता
National Girl Child Day 2026 के मौके पर आज हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा की उन एक्ट्रेसेस की, जिन्होंने अपने किरदारों, सोच और बेबाकी से ‘लड़की होना’ की परिभाषा को ही बदल दिया। एक दौर था जब महिला किरदार सीमाओं में बंधे होते थे, लेकिन इन अभिनेत्रियों ने यह साबित किया कि संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, साहस और आत्मनिर्भरता की पहचान है।
विद्या बालन: तय ढांचे को तोड़ने वाली एक्ट्रेस
विद्या बालन ने यह मिथक तोड़ा कि हीरोइन बनने के लिए एक तय शरीर या छवि जरूरी है। ‘कहानी’, ‘द डर्टी पिक्चर’ और ‘शेरनी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने आत्मनिर्भर, मजबूत और सोचने वाली स्त्री को केंद्र में रखा। उनके किरदारों ने यह दिखाया कि महिला सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि पूरी कहानी भी हो सकती है।
जान्हवी कपूर: भावनात्मक मजबूती की नई पहचान
‘धड़क’ से लेकर ‘गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल’ और ‘मिली’ तक, जान्हवी कपूर ने ऐसे किरदार चुने जो डर से लड़ते हैं और हालात के आगे झुकते नहीं। ‘गुंजन सक्सेना’ में उन्होंने दिखाया कि एक लड़की का सपना आसमान छू सकता है, वहीं ‘मिली’ में सर्वाइवल और मानसिक दृढ़ता को सादगी से पेश किया।
आलिया भट्ट: संवेदनशीलता भी एक ताकत
आलिया भट्ट ने कम उम्र में ही यह साबित कर दिया कि भावनात्मक गहराई भी बड़ी शक्ति हो सकती है। ‘हाईवे’, ‘राज़ी’ और ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में उनके किरदार संवेदनशील होने के साथ-साथ बेहद मज़बूत नजर आए, जिन्होंने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।
दीपिका पादुकोण: परदे से परे भी सशक्त आवाज़
‘छपाक’ और ‘पद्मावत’ जैसी फिल्मों में दीपिका पादुकोण ने साहस, गरिमा और आत्मसम्मान की मिसाल पेश की। इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात कर उन्होंने असल ज़िंदगी में भी लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत की भूमिका निभाई।
रानी मुखर्जी: नेतृत्व और करुणा की मिसाल 
रानी मुखर्जी ने ‘ब्लैक’, ‘मर्दानी’ और ‘हिचकी’ जैसी फिल्मों में स्त्री शक्ति को नई परिभाषा दी। उनके किरदार नेतृत्व, करुणा और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बने, जहां ‘लड़की होना’ खुद में एक ताकत बनकर उभरा।
कंगना रनौत: निडर और आत्मनिर्भर किरदार
‘क्वीन’ से लेकर ‘तनु वेड्स मनु’ तक, कंगना रनौत ने ऐसी महिलाओं को परदे पर जिया, जो खुद अपनी ज़िंदगी की दिशा तय करती हैं। उनकी बेबाकी ने ‘लड़की होना’ को निडरता और आत्मनिर्भरता की पहचान दी।
प्रियंका चोपड़ा: ग्लोबल मंच पर भारतीय लड़की 
प्रियंका चोपड़ा ने भारतीय सिनेमा की सीमाओं से बाहर निकलकर ग्लोबल स्तर पर अपनी पहचान बनाई। ‘मैरी कॉम’ जैसी फिल्म के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया कि एक लड़की सपने देखने और उन्हें पूरा करने की पूरी हकदार है।
काजोल: हर रिश्ते में मजबूत स्त्री 
काजोल ने 90 के दशक में ही सशक्त महिला किरदारों को मुख्यधारा में जगह दिलाई। ‘दुश्मन’ और ‘फना’ जैसी फिल्मों में उनकी भावनात्मक ताक़त और निर्णय लेने की क्षमता ने यह दिखाया कि मां, पत्नी या प्रेमिका—हर रूप में स्त्री मज़बूत हो सकती है।
तापसी पन्नू: सवाल करने वाली आवाज़ 
‘पिंक’ और ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों में तापसी पन्नू ने उस स्त्री को आवाज़ दी, जो चुप नहीं रहती, सवाल करती है और अपने आत्मसम्मान के लिए मजबूती से खड़ी होती है।
इन सभी एक्ट्रेसेस ने अपने किरदारों के जरिए यह साबित किया कि ‘लड़की होना’ कोई सीमा नहीं, बल्कि एक शक्ति है। National Girl Child Day के अवसर पर उनकी कहानियां हर लड़की को अपने सपनों पर विश्वास करने की प्रेरणा देती हैं।
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