मुंबई, 31 मार्च (वेब वार्ता)। ईरान में जारी युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर भारतीय मुद्रा पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। सोमवार को कारोबार के दौरान रुपया शुरुआती बढ़त बनाए रखने में असफल रहा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 95.22 के स्तर तक पहुंच गया, जो इसका अब तक का सबसे निचला स्तर है।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 93.62 प्रति डॉलर पर मजबूत शुरुआत के साथ खुला और कुछ समय के लिए 93.57 तक पहुंचा, जो पिछले बंद स्तर के मुकाबले 128 पैसे की बढ़त दर्शाता है। हालांकि यह मजबूती अधिक समय तक टिक नहीं सकी और दिन के कारोबार में रुपया तेजी से फिसल गया।
वैश्विक तनाव से बाजार में हलचल
विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, मजबूत अमेरिकी मुद्रा और ईरान से जुड़ा भू-राजनीतिक तनाव रुपये पर दबाव बना रहे हैं। इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया 89 पैसे की गिरावट के साथ 94.85 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जो उस समय का रिकॉर्ड निचला स्तर था।
मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक बाजारों को अस्थिर कर दिया है, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर अधिक पड़ रहा है। भारत जैसे देशों के लिए, जो कच्चे तेल के बड़े आयातक हैं, यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण बन जाती है।
आम लोगों पर बढ़ेगा महंगाई का बोझ
रुपए के कमजोर होने का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। विदेश से आयात होने वाली वस्तुएं महंगी हो जाएंगी, खासकर कच्चा तेल, जिससे पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है।
इसके अलावा मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दाम भी बढ़ सकते हैं, क्योंकि इनके पुर्जे विदेशों से आते हैं। माल ढुलाई महंगी होने से खाने-पीने की चीजों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि संभव है।
विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्रों और यात्रा की योजना बना रहे लोगों को भी अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे, क्योंकि डॉलर खरीदना महंगा हो गया है।
स्पष्ट है कि वैश्विक परिस्थितियों में आई इस उथल-पुथल का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों दोनों पर पड़ रहा है, जिससे आने वाले दिनों में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।



