ईरान संकट से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौतियां बढ़ने की आशंकाः फिच

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नई दिल्ली, डेस्क | वेब वार्ता

वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव और संभावित संघर्ष का असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। एजेंसी के अनुसार, यदि खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है तो तेल-गैस आयात, विदेशी मुद्रा प्रवाह और विनिमय दर जैसे क्षेत्रों में नई आर्थिक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। फिच की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस संकट का प्रभाव विशेष रूप से उन देशों पर ज्यादा पड़ सकता है जो ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर हैं और जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से दबाव में है।

फिच रिपोर्ट में जताई गई चिंताएं

‘ईरान संघर्ष से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उपजे नए ऋण जोखिम’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में फिच ने कहा कि यदि खाड़ी क्षेत्र से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में अपेक्षा से अधिक व्यवधान होता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों और निवेशकों की धारणा पर भी पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में वैश्विक स्तर पर जोखिम बढ़ने से अमेरिकी डॉलर मजबूत हो सकता है और कई विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कर्ज जुटाना कठिन हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, खासकर उच्च जोखिम वाले उधारकर्ताओं के लिए विदेशी बाजारों से कर्ज जारी करना मुश्किल हो सकता है, जिससे कई देशों की वित्तीय योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से बढ़ेगा महंगाई का दबाव

फिच ने कहा कि यदि ईरान संकट के कारण तेल और गैस की कीमतों में तेज वृद्धि होती है तो इसका सीधा असर महंगाई दर पर पड़ेगा। इससे कई देशों के केंद्रीय बैंकों को अपनी मौद्रिक नीति में बदलाव करने पड़ सकते हैं। ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ने की संभावना है।

आर्थिक क्षेत्रसंभावित प्रभाव
तेल और गैस आयातआयात लागत में वृद्धि
विनिमय दरअमेरिकी डॉलर मजबूत होने की संभावना
महंगाईऊर्जा कीमतों के कारण मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी
कर्ज बाजारउच्च जोखिम वाले देशों के लिए विदेशी कर्ज महंगा

भारत सहित कई देशों पर पड़ सकता है असर

रिपोर्ट के मुताबिक, तेल और गैस आयात पर निर्भर देशों पर इस संकट का सबसे ज्यादा असर देखने को मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में शुद्ध जीवाश्म ईंधन आयात सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग तीन प्रतिशत या उससे अधिक के बराबर है। ऐसे में ऊर्जा कीमतों में वृद्धि होने पर आयात बिल बढ़ सकता है और आर्थिक संतुलन पर दबाव पड़ सकता है।

  • ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर अधिक प्रभाव
  • तेल-गैस कीमतों से आयात बिल बढ़ने की आशंका
  • विनिमय दर और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव

होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान से बढ़ सकता है संकट

फिच ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल और गैस का परिवहन एक महीने से कम समय के लिए बाधित होता है और उत्पादन ढांचे को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता, तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं की साख पर जोखिम सीमित रह सकता है। हालांकि अगर यह व्यवधान लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान जैसे देशों पर इसका दबाव अधिक पड़ सकता है, जहां वित्तीय स्थिति पहले से कमजोर है और चालू खाते का घाटा भी अधिक है। आयात लागत बढ़ने से इन देशों की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

निष्कर्ष

फिच की रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि ईरान से जुड़ा भू-राजनीतिक संकट केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऊर्जा कीमतों, महंगाई और कर्ज बाजार से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और राजनीतिक घटनाक्रम पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।


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