नई दिल्ली, विशेष संवाददाता | वेब वार्ता
भारत में क्विक कॉमर्स का जादू – 10 मिनट में घर पर सामान – अब संकट में दिख रहा है। नए साल की पूर्व संध्या पर गिग वर्कर्स की राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने जैप्टो, ब्लिंकिट और स्विगी इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स को झकझोर दिया। करीब 2 लाख राइडर्स ने हड़ताल की, मांगें – उचित भुगतान, सुरक्षा और सम्मान। यूनियन नेताओं का कहना है कि समस्या की जड़ 10 मिनट की डिलीवरी टाइमलाइन है, जिसे खत्म किए बिना हालात नहीं सुधरेंगे। क्या यह मॉडल अब टिकाऊ नहीं रहा? हड़ताल ने निवेशकों को चिंता में डाल दिया है और शेयरों में गिरावट आई है। लेकिन कंपनियां दावा कर रही हैं कि असर नगण्य है। यह बहस उपभोक्ता सुविधा और वर्कर्स के अधिकारों के बीच संतुलन पर सवाल खड़े कर रही है।
हड़ताल की वजह: 10 मिनट की रेस में वर्कर्स का दर्द
कोरोना काल में शुरू हुआ क्विक डिलीवरी मॉडल भारत में सुपरहिट रहा। ब्लिंकिट, स्विगी इंस्टामार्ट और जैप्टो ने डार्क स्टोर्स पर भारी निवेश किया। लेकिन वर्कर्स का कहना है कि 10 मिनट की डेडलाइन उन्हें जोखिम भरी ड्राइविंग के लिए मजबूर करती है। देरी पर खराब रेटिंग, दंड और दबाव से दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। दिल्ली जैसे शहरों में ट्रैफिक और प्रदूषण ने हालात और खराब किए। हड़ताल में वर्कर्स ने बेहतर पे, इंश्योरेंस और कार्य घंटों की मांग की। यूनियनों का तर्क – यह मॉडल वर्कर्स की कीमत पर चल रहा है।
कंपनियों का पक्ष: असर नगण्य, रिकॉर्ड ऑर्डर्स
एटरनल (जोमैटो-ब्लिंकिट की पेरेंट) के सीईओ दीपिंदर गोयल ने दावा किया कि 31 दिसंबर को 7.5 मिलियन ऑर्डर्स का रिकॉर्ड बना। हड़ताल को “शरारती तत्वों” की करतूत बताया। उनका तर्क – 10 मिनट डिलीवरी इंफ्रा से संभव है, स्पीड से नहीं। राइडर्स की औसत स्पीड 16 km/h है और लॉग-इन पर 102 रुपये/घंटा कमाई। लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह औसत है, वास्तविक कमाई कम और घंटे लंबे हैं।
निवेशकों की चिंता: शेयरों में गिरावट, भविष्य पर सवाल
ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर से स्विगी और एटरनल के शेयर 20% गिर चुके हैं। नए लेबर कोड से गिग वर्कर्स को सोशल सिक्योरिटी मिलने की चिंता है। अमेरिका में कई क्विक डिलीवरी प्लेटफॉर्म बंद हो चुके हैं। भारत में Savills Plc का अनुमान – 2030 तक डार्क स्टोर्स 2500 से 7500 हो सकते हैं। लेकिन हड़ताल ने मॉडल की टिकाऊता पर सवाल खड़े किए।
प्रमुख आंकड़े एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| हड़ताल में राइडर्स | करीब 2 लाख |
| रिकॉर्ड ऑर्डर्स (31 दिसंबर) | 7.5 मिलियन |
| शेयर गिरावट (अक्टूबर से) | स्विगी-एटरनल में 20% |
| डार्क स्टोर्स अनुमान (2030) | 7500 |
| औसत कमाई (कंपनी दावा) | 102 रुपये/घंटा |
यह तालिका मॉडल की स्थिति को स्पष्ट करती है।
आगे क्या?: मॉडल में बदलाव जरूरी
भारत में श्रमिकों की भरमार से नए राइडर्स जुड़ते रहते हैं, इसलिए उपभोक्ताओं को डिलीवरी मिलती रहेगी। लेकिन वर्कर्स की शिकायतें – सुरक्षा, भुगतान और कार्य घंटे – अनदेखी नहीं की जा सकतीं। नए लेबर कोड से बदलाव आ सकता है। कंपनियों को मॉडल में सुधार करना होगा, वरना हड़तालें बढ़ेंगी।
सुविधा और अधिकारों का संतुलन
10 मिनट डिलीवरी मॉडल संकट में है, लेकिन खत्म नहीं होगा। हड़ताल ने वर्कर्स के दर्द को उजागर किया। कंपनियां दावे कर रही हैं कि असर कम है, लेकिन निवेशक चिंतित हैं। सरकार और कंपनियों को वर्कर्स के अधिकारों पर ध्यान देना होगा। उपभोक्ता सुविधा महत्वपूर्ण है, लेकिन वर्कर्स की सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए। यह बहस क्विक कॉमर्स के भविष्य को तय करेगी।




