-राकेश त्रिपाठी-
यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेशक यूजीसी को डांट लगाई हो, इस मामले को बहुत जल्दी ही राजनैतिक दल अपने-अपने फायदे के लिए उठा लेंगे। लेकिन जिस तरह से इसे अमली जामा पहनाने की कोशिश हुई, उसे देख कर यही कहा जा सकता है कि इस तरह के नियम बना कर बीजेपी ने खुदकुशी करने की कोशिश की है। किसी सवर्ण छात्र के खिलाफ कैसी भी शिकायत हुई हो, शिकायत सच हो या झूठी, दोषी उसे ही माना जाएगा, जिसके खिलाफ शिकायत हुई है। धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं भेदभाव नहीं होने देंगे, तो क्या हम मान लें कि धर्मेंद्र प्रधान अनंत काल तक शिक्षा मंत्री बने रहेंगे? किस हैसियत से वे ये गारंटी दे रहे हैं?
होना तो ये चाहिए था कि ये कांड करने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को मोदी सीधे रास्ता दिखा देते। कि भई बहुत हो चुका तुम्हारा खेल, जाओ थोड़ा पार्टी का काम करो। और वह होगा ज़रूर, संभव है कुछ महीनों बाद हो, लेकिन धर्मेंद्र यादव कैबिनेट में 6 महीने से ज्यादा नहीं रहेंगे, ये तय है। क्योंकि उन्होंने जो वमन किया है उसकी सफाई करते बीजेपी और मोदी सरकार को सालों लग जाएंगे।
लेकिन सवाल ऐसे शिक्षामंत्री से ज़रूर होगा कि जब तुमने कानून ही भेदभाव वाला बनाया तो उसका लोग मिसयूज नहीं, यूज ही करेंगे सब। क्योंकि तुमने नियम बनाए ही यूज़ करने के लिए हैं। शंका होती है कि क्या इन नियमों का मतलब ही है कि सवर्णों के बच्चों को हायर एजुकेशन लेने से रोका जाय और न सिर्फ रोका जाए बल्कि जेल तक भेजा जाय?
अजीब सी बात है कि शिक्षामंत्री खुद पिछड़ी जाति से हैं, हमारे प्रधानमंत्री भी पिछड़ी जाति से हैं। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान को इतनी जल्दी है तथाकथित पिछड़ों को आगे लाने की, कि तर्क, बुद्धि, सब किनारे रख कर सवर्णों को पलीता लगाने के चक्कर में लग गए। कई बार लगता है कि कहीं ये मंत्री कांग्रेस की तरफ से प्लांटेड तो नहीं है। या समाजवादी पार्टी का भी हो सकता है ये मंत्री। शिक्षा मंत्री रहते जो काम था इनका, वो तो इन्होंने किया नहीं, संघ ने कितना समझा बुझा कर भेजा था कि अंग्रेज़ों और कम्युनिस्टों का लिखा इतिहास बदलो। जिस इतिहास को तुम गालियां देते थे, जब उसे बदलने का मौका मिला, तो उसको कितना खत्म किया तुमने? जो असली काम था, वो तो भूल गए। या शायद दम नहीं था तुम्हारी सरकार में, कि कम्युनिस्टों के लिखे झूठे और अपमानजनक इतिहास को मिटा कर इस देश का इतिहास लिखते। क्योंकि उसके लिए हैसियत चाहिए, जो है नहीं।
सवाल ये भी उठता है कि ये नियम कैसे बना दिया गया कि जिसके खिलाफ शिकायत हुई, उसे शिकायत होते ही दोषी मान लिया जाय। उसका तो करियर गया और राजनीति ने अगड़ों और पिछड़ों को आमने सामने खड़ा कर दिया और इस बात को कानूनी जामा पहना दिया कि पिछड़ों तुम अगड़ों का जीना मुहाल कर दो, इनकी ऐसी तैसी कर दो, मैं तुम्हें कानूनी संरक्षण देता हूं। सवाल ये भी कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला केस के बाद गाइडलाइंस एससी-एसटी के लिए बनाने को कहा था, तो तुमने ‘बैकवर्ड’ क्यों जोड़ दिया भई? तो शिक्षा मंत्री चालाकी दिखा रहे हैं या पिछड़ों के मसीहा बनने की कोशिश में एक्सपोज़ हो रहे हैं?
दूसरी बात कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि जो शिकायत करने वाला हो अगर उसकी शिकायत झूठी पाई जाए, तो भी उस पर कोई एक्शन न हो, उसे जाने दिया जाए? धर्मेंद्र प्रधान को बिना सुप्रीम कोर्ट की आड़ लिए ये बताना होगा कि उन्होंने बतौर मंत्री ये क्यों किया। ये कानून तो बिलकुल वैसा ही है जैसा यूपीए के शासन में एंटी कम्युनल बिल लाया गया था कि दंगा कोई भी समुदाय करे, दोषी हिंदू ही माना जाएगा। गजब है भई। इसीलिए कई बार शंका होती है कि बीजेपी और कांग्रेस में कोई फर्क है क्या।
हैरानी की बात ये कि 8 दिसंबर 2025 को जब ये रिपोर्ट संसद की स्टैंडिंग कमेटी के सामने रखी गई तो वहां भी किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। वहां बल्कि सबने कहा कि इसमें बैकवर्ड्स को भी शामिल कर लेना चाहिए। लेकिन क्यों करना चाहिए, ये किसी ने सवाल नहीं किया क्योंकि सभी पार्टियों को ये बात सूट करती है। हैरानी इस बात पर भी होती है कि 2012 की जो गाइडलाइंस थीं, वो रोहित वेमिला के सुसाइड के बाद बनी थीं, लेकिन रोहित वेमुला के सुसाइड लेटर में कहीं ये नहीं लिखा कि उनको सवर्णों ने प्रताड़ित किया, इसलिए वो सुसाइड कर रहे हैं। यहां तक लिखा है कि मेरे किसी दोस्त या दुश्मन को मेरे सुसाइड के लिए टारगेट न किया जाए। उस समय वहां टीआरएस की सरकार थी, अभी कांग्रेस की सरकार है, बीजेपी की तो रही नहीं सरकार कभी, इसलिए पुलिस की क्लोज़र रिपोर्ट पर सवाल तो किया नहीं जा सकता। बीजेपी की सरकार तो थी नहीं, तो आप ये नहीं कह सकते कि बीजेपी के दबाव में ऐसा हुआ। क्लोज़र रिपोर्ट में साफ लिखा है कि कहीं से कोई ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे कहा जा सके कि सुसाइड प्रताड़ना के चलते हुआ। इसके बावजूद इतना हो-हल्ला मचाया गया पूरे देश में, क्योंकि मुद्दा बनाना था।
ताज़ा मामले में तो धर्मेंद्र प्रधान ये कह कर भी बच नहीं सकते कि यूजीसी ने कर दिया, हम क्या करें। क्योंकि पिछले कुछ अरसे से यूजीसी का कोई चेयरमैन है ही नहीं और मंत्रालय का ही एक अफसर ये ज़िम्मेदारी निभा रहा है। तो इसकी ज़िम्मेदारी भी तो लेनी होगी मंत्री जी को, क्योंकि ये उनका ही अफसर है।
हैरानी इस बात को लेकर है कि संसदीय समिति में चेयरमैन बेशक दिग्विजय सिंह हों, जो मेम्बर्स थे उनमें से किसी ने ये क्यों नहीं देखा, जो सुप्रीम कोर्ट ने एक निगाह में देख कर कर दिया। उस कमेटी में कुल 30 सदस्य थे, इनमें राज्यसभा से 9 और लोकसभा से 21 सांसद शामिल हैं। इनमें बीजेपी के 16, कांग्रेस के 4, सपा के 3, तृणमूल के 2, सीपीएम के 1, डीएमके के 1, एनसीपी (अजीत)-1, एनसीपी (शरद)-1 और आम आदमी पार्टी की 1 पूर्व सदस्य हैं। बीजेपी के रविशंकर प्रसाद भी थे, बांसुरी स्वराज भी थीं। आसान भाषा में समझें तो समिति में सत्ताधारी भाजपा के नेताओं की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। इसके दो मतलब हो सकते हैं। एक – कि बीजेपी के सभी सोलहों सांसदों की मंशा ऐसा ही कानून बनाने की थी। दूसरा – कि इनमें से किसी ने ये नियम पढ़े ही नहीं, और ओके कर दिया। मुझे ये दूसरी संभावना ही ज्यादा जंचती है, ये संभावना बीजेपी के खोखले हो रहे नालायक सांसदों को एक्सपोज़ करती है। सांसद बनने के बाद भी काम-वाम में इनको कोई रुचि नहीं है। मुझे संदेह है कि इन 16 सांसदों में से किसी ने इन नियमों को कायदे से पढ़ा भी होगा। ये भी तुलना नहीं की होगी कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या करने को कहा था और हम क्या कर रहे हैं। भई सुप्रीम कोर्ट ने तो ‘बैकवर्ड’ शब्द डालने को नहीं कहा था—वह निर्देश तो सिर्फ एससी/एसटी के लिए था—तो किसी ने ये भी नहीं देखा कि दरअसल इसमें लिखा क्या है।
तो दोस्तों ये घटना हमारे संसदीय कामकाज की पोल खोलती है। ये घटना ये बताती है कि हम जिन्हें भेजते हैं चुन कर, वे थोड़े से भी ज़िम्मेदार नहीं है। शायद कोई अफसर होता तो अब तक तो नप जाता, लेकिन सांसद हैं, कैसे कोई पूछ सकता है भला। इसलिए मेरा मानना है कि ये वक्त है ये जान लेने का भी कि ये चुने हुए लोग जनता की तकलीफों के बारे में कितने चिंतित हैं।
एक प्रावधान है इन नियमों का कि जिस छात्र के खिलाफ शिकायत हुई है, अगर उसके खिलाफ कोई ऐक्शन कालेज या यूनिवर्सिटी नहीं लेती है, तो उस संस्थान की डिग्री देने की ताकत ले ली जाएगी। मतलब ये ताकत आप ले लेंगे लेकिन उस घटना की जांच नहीं कराएंगे। दूसरी बात जांच के लिए जो समिति बनेगी उसमें हर वर्ग के सदस्य का प्रतिनिधि होना चाहिए, ऐसा लिखा है, लेकिन ये नहीं लिखा कि सामान्य वर्ग का भी एक प्रतिनिधि हो। तो क्या सवर्णों के खिलाफ टिप्पणियां नहीं होतीं? उनकी जाति का नाम ले कर भी तो टिप्पणियां होती हैं, लेकिन वो कहीं शिकायत करने जा नहीं सकता।
अजीब सी बात ये कि गाइडलाइंस में लिखा है कि अगर किसी को ‘महसूस’ भी हुआ कि कोई सवर्ण छात्र उसकी जाति को लेकर टिप्पणी कर रहा है, तो भी वो शिकायत डाल सकता है। अब सोचिए इस ‘महसूस’ करने को कैसे परिभाषित करेंगे आप। उस पर तुर्रा ये कि ये पीनल कोड है, इसका मतलब पुलिस सीधे इन्वाल्व होगी।
इसीलिए दोस्तों, जाति वाली पिच बीजेपी के लिए बड़ी खुरदुरी है, उबड़-खाबड़ है। इस पिच पर पहले से ही बड़े-बड़े महंत खड़े हैं, उस पिच पर बॉल कभी भी उछल कर आपको कहीं भी लग सकती है। बीजेपी की पिच हिंदुत्व की है, उसे छोड़ कर इस जाति की पिच पर खेलने न आएं, ये बिन मांगी सलाह है मेरी। चिंता इस बात की है कि जिस एजेंडे को राहुल गांधी इतने दिनों से लाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन एजेंडा बना नहीं पा रहे थे, उस एजेंडे को बीजेपी की सरकार ने प्लेट में रख कर राहुल गांधी को दे दिया है।
जहां एक ओर मोदी की सरकार विकास के कामों को लेकर आगे बढ़ रही थी, जहां एक ओर पूरे विश्व में इस बात की चर्चा है कि भारत का ग्रोथ रेट अगले दो साल तक सबसे ज्यादा रहने वाला है, वहां चलिए पहले जात-जात खेल लेते हैं… तू किस जात का है, मैं किस जात का हूं, पिछड़ा कौन-अगड़ा कौन, पूरा देश इस पर विमर्श कर रहा है। किसी एक पार्टी या किसी एक शख्स की मूर्खता से क्या होने जा रहा है, दुनिया ये देख रही है।
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