लक्ष्मी कान्त पाठक | वेब वार्ता
भारत आज एक विचित्र द्वंद्व के दौर से गुजर रहा है—जहाँ सनातन धर्म का नाम लेकर सत्ता तो साधी जा रही है, लेकिन उसकी मूल आत्मा लगातार आहत हो रही है। यह वही देश है जहाँ मंदिरों के प्रांगण में मौन पसरा है, जहाँ अहिल्याबाई होलकर जैसी महान भक्त, प्रशासक और समाजसेविका की प्रतिमाएं उपेक्षा की धूल में ढकी पड़ी हैं, और जहाँ धर्म, संस्कृति व परंपरा को नारे और प्रोपेगेंडा में बदल दिया गया है।
सनातन के नाम पर सियासत, चेतना पर प्रहार
आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो शक्तियाँ स्वयं को हिंदू और सनातन धर्म के रक्षक बताती हैं, वही सबसे अधिक इस धर्म की मूल चेतना को चोट पहुँचा रही हैं। समरसता की बातें करने वाले संगठन व्यवहार में समाज को जातियों और वर्गों में बाँट रहे हैं। धर्म के नाम पर खड़ा किया गया यह दिखावटी नैरेटिव अब राजनीतिक हथियार बन चुका है—जहाँ भक्ति के स्थान पर ब्रांडिंग और आस्था के स्थान पर अंधसमर्थन ने जगह ले ली है।
अंदरूनी क्षरण: जब सनातन भीतर से कमजोर होता है
इतिहास गवाह है—सनातन धर्म को जितनी क्षति भीतर से हुई, उतनी किसी बाहरी आक्रमण से नहीं। मुग़ल और अंग्रेज़ शासन में भी संस्कृति जीवित रही, लेकिन आज वह अपने ही कथित संरक्षकों के कारण बिखर रही है। समाज की एकता को जाति, वर्ग और पहचान की दीवारों में बाँट दिया गया है। यह विभाजन केवल समाज को नहीं, बल्कि विचार और विवेक को भी दुर्बल कर रहा है।
कथावाचक और ठेकेदार: आस्था की जगह व्यापार
आज के कथावाचक और धार्मिक प्रचारक ‘धर्म’ नहीं, बल्कि ‘दिखावा’ बेच रहे हैं। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि केवल अनुष्ठान, दान या जप से जीवन बदल सकता है, जबकि सनातन का सार सदैव रहा है—कर्म, नैतिकता और विवेक। धर्म जब आचरण से हटकर प्रदर्शन बन जाए, तो वह संवेदना नहीं, सत्ता का औजार बन जाता है।
ब्राह्मण से दलित तक: टूटती सामाजिक धारा
सत्ता आज जानती है कि संगठित समाज सवाल पूछता है। इसलिए जानबूझकर ब्राह्मण, पिछड़े और दलित समाजों के बीच वैचारिक दरारें पैदा की जा रही हैं। उत्तर प्रदेश में यह प्रयोग स्पष्ट दिख रहा है—जहाँ सामाजिक चेतना को ‘समर्थन’ और ‘विरोध’ की दो सीमाओं में बाँट दिया गया है। समाज अब राजनीतिक प्रयोगशाला में तब्दील हो चुका है, और यही सबसे बड़ा खतरा है।
रामराज्य या प्रतीकवाद?
आज ‘रामराज्य’ का नारा दिया जा रहा है, लेकिन यथार्थ यह है कि न न्याय है, न करुणा, न मर्यादा। रामराज्य केवल मंदिरों या नारों से नहीं आता, वह आता है न्याय, समानता और करुणा के व्यवहार से। जब सत्ता और समाज दोनों दिखावे की मर्यादा में जीने लगें, तो धर्म केवल मंचों और पोस्टरों तक सीमित रह जाता है।
सनातन की रक्षा कैसे?
अब समय है कि हम सत्ता और संगठन की सीमाओं से ऊपर उठकर सनातन के वास्तविक मूल्यों की ओर लौटें। सत्य, करुणा, समता और संवेदना—यही वह चार स्तंभ हैं जो सनातन को जीवित रखते हैं। यदि हम इन मूल्यों से विमुख हुए, तो यह सभ्यता केवल ग्रंथों में रह जाएगी, जीवन में नहीं।
निष्कर्ष: सनातन सत्ता का नहीं, चेतना का धर्म है
सनातन किसी दल, संगठन या व्यक्ति की बपौती नहीं है। यह भारत की आत्मा है—जो करुणा, न्याय और विवेक में बसती है। हमें यह समझना होगा कि धर्म को बचाने के लिए सत्ता की नहीं, बल्कि चेतना की जरूरत है। तभी भारत फिर उस दिशा में लौट सकेगा, जहाँ रामराज्य केवल स्वप्न नहीं, वास्तविकता बनेगा।
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