-सौरभ वार्ष्णेय-
कहते है कि पवित्र रमजान का महीना आत्मसंयम, करुणा और इंसानियत की सेवा का संदेश देता है। ऐसे समय में काबुल पर हुआ कथित कायराना हमला न सिर्फ मानवीय मूल्यों का अपमान है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय भी है। जब दुनिया शांति और सह-अस्तित्व की बात कर रही हो, तब इस तरह की हिंसक घटनाएं सभ्यता के मूल सिद्धांतों को चुनौती देती हैं।
रमजान का सार ही यह है कि इंसान अपने भीतर झांककर बुराइयों से दूर रहे और समाज में प्रेम, भाईचारे और सहयोग को बढ़ावा दे। लेकिन काबुल में हुआ हमला इस पवित्र भावना के ठीक विपरीत है। निर्दोष लोगों की जान लेना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह न केवल एक देश की संप्रभुता पर हमला है, बल्कि पूरी मानवता के खिलाफ अपराध है। यदि इस हमले में किसी भी देश या तत्व की संलिप्तता साबित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बिना किसी भेदभाव के सख्त कदम उठाने चाहिए। आतंक और हिंसा के प्रति ‘चयनात्मकÓ रवैया ही ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देता है। जरूरत इस बात की है कि वैश्विक मंचों पर एकजुट होकर आतंकवाद के खिलाफ ठोस और निष्पक्ष नीति अपनाई जाए। दक्षिण एशिया पहले से ही अस्थिरता और अविश्वास के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में इस तरह की घटनाएं क्षेत्रीय शांति को और कमजोर करती हैं। यह समझना होगा कि युद्ध और हिंसा का रास्ता किसी समस्या का समाधान नहीं है। बातचीत, कूटनीति और आपसी विश्वास ही स्थायी शांति का आधार बन सकते हैं।आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम रमजान जैसे पवित्र अवसर पर भी इंसानियत का सम्मान नहीं कर सकते? काबुल की यह घटना हमें चेतावनी देती है कि अगर समय रहते हिंसा के इस चक्र को नहीं रोका गया, तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं। यह समय है जब दुनिया को एकजुट होकर यह संदेश देना चाहिए कि इंसानियत सर्वोपरि है। किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह किसी भी नाम पर हो, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। रमजान के इस पावन महीने में शांति, सहिष्णुता और मानवता के मूल्यों को पुन: स्थापित करना ही सच्ची श्रद्धा होगी।
यह हमला ऐसे समय में हुआ जब तीन देश आमने सामने खुलेआम मिसाइलों से हमले कर रहे हैं । इस युद्व की वजह से पूर्ण विश्व महंगाई सहित अन्य चीजों से कराहा उठा है। कच्चे तेल ने खेल ही कर दिया। बात कर रहे हैं पाकिस्तान की जो कि अन्य देशों की तुलना में भुखमरी के कगार पर है ऐसे में वह काबुल पर असमय बमबारी कर रहा है मासूमों की जान ले रहा है। पूरा विश्व खामोशी के साथ यह सब देख रहा है। ज्ञात रहे कि पाकिस्तान को अपने आस्तीन में पालने वाले देश भी भलीभांति जान ले कि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है सबसे पहले वही उस गड्ढे में गिरता है। ऐसा ही हाल उन देशों का हो रहा है जो अपने महान देश बनाने के चक्कर में शांति के लिये भी खतरा बनते जा रहे हैं।
ऐसे पाकिस्तान देश कितने दिनों के हैं। जब दूसरे पर बम फोड रहे हैं तो दूसरा देश बदला तो लेगा ही। कहने का आशय है कि जो देश गरीबी में जी हरा है। वह अपने को विकास करने की जगह अपने को आग की भट्टी में झोंक रहा है।
भारत ने भी कड़े शब्दों में निंदा कर कहा है कि पाकिस्तान अब इस नरसंहार को सैन्य अभियान का नाम देने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा किया गया यह घृणित आक्रमण अफगानिस्तान की संप्रभुता पर एक स्पष्ट हमला है और क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता के लिए सीधा खतरा है। यह पाकिस्तान के लगातार लापरवाह व्यवहार और अपनी आंतरिक विफलताओं को सीमा पार हिंसा के बढ़ते हिंसक कृत्यों के माध्यम से छिपाने के बार-बार किए जाने वाले प्रयासों को दर्शाता है। यह हमला रमजान के पवित्र महीने के दौरान किया गया, जो दुनिया भर के मुस्लिम समुदायों के लिए शांति, चिंतन और दया का समय होता है, जो इसे और भी निंदनीय बनाता है। ऐसा कोई धर्म, कोई कानून या कोई नैतिकता नहीं है जो किसी अस्पताल और उसके मरीजों को जानबूझकर निशाना बनाने को उचित ठहरा सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस आपराधिक कृत्य के दोषियों को जवाबदेह ठहराना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान द्वारा नागरिकों को निशाना बनाने का यह अंधाधुंध हमला तत्काल बंद हो।
पाकिस्तान को स्वयं अपने अंदर झांकना चाहिए। १९४७ से भारत से अलगहोकर पता नहीं क्यों अपने अंदर इतनी नफरत पाल ली है कि उसमें से वह निकलना नहीं चाहता ? दो भाई जब अलग होते हैं जो कि एक सामान्य सी प्रक्रिया है। हालांकि अलग होने में दर्द बहुत होता है लेकिन विस्तार के लिए यानी पाकिस्तान का जिसके लिए निर्माण हुआ वह १९४७ के बाद से आज तक दिखा नहीं? पाकिस्तान को भारत को कमजोर करने के लिए कुछ विदेशी ताकतें पोश रही है लेकिन भारत पूर्व में भी अपनी शांति का परिचय देता आया है लेकिन जब जब जरूरत पड़ी तब तब अदम्य साहस विकसितता का परिचय देता आया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।)







