बेबवार्ता न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकान्त पाठक का राजनैतिक विश्लेषण
भारतीय लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम विपक्ष होता है। किंतु पिछले एक दशक में विपक्ष इस भूमिका को निभाने में जिस तरह असफल रहा है, वह अपने आप में एक गंभीर राजनीतिक प्रश्न बन चुका है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को समझने और उसका प्रभावी सामना करने में विपक्ष की चूक ने ही उन्हें लगातार सशक्त बनाए रखा है।
आज यह धारणा आम होती जा रही है कि नरेंद्र मोदी को हराना कठिन है। यह कठिनाई केवल उनकी राजनीतिक कुशलता, संगठनात्मक क्षमता या चुनावी प्रबंधन का परिणाम नहीं है, बल्कि विपक्ष की रणनीतिक दिशाहीनता से भी उपजी है। ऐसे अनेक अवसर आए, जब सरकार की नीतियों, आर्थिक निर्णयों या सामाजिक प्रयोगों पर गंभीर और जनहित से जुड़े सवाल उठाए जा सकते थे। लेकिन उन मौकों पर विपक्ष या तो आपसी भ्रम में उलझा रहा या फिर ऐसे मुद्दों को लेकर सामने आया, जिनका जनता की रोज़मर्रा की चिंताओं से सीधा संबंध नहीं बन सका।
राजनीति केवल आरोप-प्रत्यारोप का मंच नहीं होती। यह सही समय पर सही मुद्दों को उठाने की कला और निरंतरता की मांग करती है। इस कसौटी पर विपक्ष बार-बार विफल होता दिखाई देता है। नतीजतन सरकार की वास्तविक कमजोरियाँ विमर्श के केंद्र में आने से पहले ही हाशिये पर चली जाती हैं और सार्वजनिक बहस शोरगुल में तब्दील हो जाती है।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शक्ति का एक बड़ा आधार उनका व्यक्तिगत आभामंडल है। यह आभामंडल वर्षों की राजनीतिक यात्रा, सधे हुए संप्रेषण और निर्णायक नेतृत्व की छवि से निर्मित हुआ है। वे स्वयं को ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं, जो निर्णय लेने में संकोच नहीं करता और संकट की घड़ी में स्पष्ट दिशा देता है। जनता का एक बड़ा वर्ग इसी नेतृत्व छवि से स्वयं को जोड़ता है।
इसी कारण उनके चरित्र या नीयत पर केंद्रित हमले अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाते। जब ऐसे आरोप उन राजनीतिक दलों की ओर से आते हैं, जिनकी अपनी विश्वसनीयता पहले से ही सवालों के घेरे में रही हो, तो उनकी धार और भी कुंद हो जाती है। राजनीति में नैतिकता का प्रश्न तभी प्रभावी बनता है, जब प्रश्न उठाने वाला स्वयं उस कसौटी पर खरा उतरता दिखाई दे।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य मामलों में प्रधानमंत्री की भूमिका भी इस राजनीतिक छवि को और मजबूती देती है। सेना को परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता देने जैसे वक्तव्य केवल प्रशासनिक घोषणाएँ नहीं होते, बल्कि वे नेतृत्व के संकेत के रूप में देखे जाते हैं। इन संकेतों का राजनीतिक लाभ सत्ता को मिलता है, भले ही उनके व्यावहारिक परिणामों पर मतभेद क्यों न हों।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि मोदी सरकार आलोचना से परे रही है। आर्थिक असमानता, सामाजिक समरसता, रोजगार संकट और संघीय ढांचे से जुड़े प्रश्न ऐसे विषय हैं, जिन पर निरंतर, संयमित और तथ्यपरक विपक्षी राजनीति सरकार को वास्तविक दबाव में ला सकती थी। किंतु इन मुद्दों पर टिके रहने की क्षमता और राजनीतिक धैर्य विपक्ष में प्रायः दिखाई नहीं देता।
अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि जब अवसर सामने होता है, तब विपक्ष या तो बिखरा होता है या आत्मविश्वास से रिक्त। राजनीतिक संघर्ष के मैदान में गेंद हवा में होती है, लेकिन उसे थामने के लिए सजग हाथ आगे नहीं बढ़ता।
इसी कारण आज की राजनीति में नरेंद्र मोदी की मजबूती से अधिक चर्चा विपक्ष की कमजोरी की होती है। जब तक विपक्ष अपनी प्राथमिकताएँ स्पष्ट नहीं करता, विश्वसनीय वैकल्पिक राजनीति प्रस्तुत नहीं करता और आरोपों के स्थान पर ठोस मुद्दों पर टिकना नहीं सीखता, तब तक सत्ता परिवर्तन की संभावना केवल सैद्धांतिक बहस बनी रहेगी।
मोदी को हराने का प्रश्न व्यक्तियों का नहीं, बल्कि राजनीति की समझ का प्रश्न है—और फिलहाल इस समझ की सबसे बड़ी कमी विपक्ष में ही दिखाई देती है।








