
देश की अन्तर्राष्ट्रीय छवि निरंतर सकारात्मक दिशा में नये कीर्तिमान स्थापित कर रही है। विश्व समुदाय भारत को एक सशक्त राष्ट्र मानने लगा है। आर्थिक मोर्चे से लेकर कूटनीति के मामलों में विगत कुछ सालों में सफलताओं का अम्बार लग गया है। विसम परिस्थितियों में विदेशों से भारतवासियों की सकुशल वापसी जैसे अनेक उदाहरण सामने आये हैं। शत्रुता रखने वाले अनेक पडोसियों देशों के नागरिकों ने भी तिरंगे को कवच बनाकर अपने जीवन को सुरक्षित किया था। वर्तमान युद्ध की भीषण विभीषिका सामने है। पैट्रोलियम पदार्थों की विश्व व्यापी समस्या है। ऐसे में भी भारत के जहाज दुर्गम क्षेत्रों से निकल कर आ रहे हैं। समूचा संसार इस अघोषित तीसरे विश्व की विकराल होती स्थिति में भारत की ओर देख रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी विदेश टीम, सुरक्षा टीम और बाह्य व्यवस्था टीम पूरी तरह से सफल ही रही है परन्तु देश के अन्दर के हालातों को नियंत्रण करने वाली कथित टीम के हालिया कृत्यों से समूचा देश आहत है। अनेक प्रदेशों की सरकारों को रिमोट से चन्द चालाक लोग चला रहे हैं। उन राज्यों के मुख्यमंत्री का पदीय ज्ञान तो प्रारम्भ से ही प्रश्ववाचक चिन्हों के घेर में रहा है। महात्वपूर्ण विभागों पर नियंत्रण रखने वाले उत्तरदायी जनप्रतिनिधियों की योग्यता, व्यवहारिक अनुभव और क्षमतायें शुरू से ही कटघरे में रहीं हैं। उन राज्यों की लालफीताशाही के किस्से तो तानाशाही के अनेक दृष्टान्तों को भी शर्माने पर मजबूर कर देते हैं। भ्रष्टाचार के अनेक भूमिगत उदाहरण न्याय के मंदिर में पहुंचने से पहले ही मौत के मुंह में पहुंचा दिये जाते हैं। कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर ईमानदार करदाताओं के खून की कमाई को मुफ्तखोरों पर लुटाया जा रहा है। अकर्मण्यता की नई पाठशालायें बनने वाली योजनाओं से देश की नींव निरंतर खोखली होती जा रही है तिस पर सम्प्रदायगत, जातिगत, वर्गगत, भाषागत, क्षेत्रगत जैसे संघर्षों की पटकथा लिखने वाले कानूनों, नियमों और व्यवस्था का तूफानी दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। चौराहों से लेकर चौपालों तक बारूदी सुरंगें बिछाई जा चुकीं हैं जिन्हें केवल और केवल चिन्गारी दिखाने की जरूरत है। कभी पिछडे होने का राग अलाप कर एकता के संगीत को विकृत किया गया तो कभी अयोग्य पात्रों के हाथों में व्यवस्था थमाकर क्षमताओं को दीमक की भेंट चढा दिया गया। कभी शोषण की मनगढन्त विवेचना करके विशेषाधिकार दिया गया तो कभी एकतरफा कानून को न्यायसंगत बताया गया। सम्प्रदायों को लडाने वाले कानून को संविधान का अंग बनाकर थोपने वालों ने अब जातिगत वैमनुष्यता फैलाने का भी ठेका ले लिया है। एक वर्ग को विकल्पविहीन बनाकर स्वयं ठेकेदार बनने वाले लोग अब मोदी की मेहनत पर चालाकी से चांदी करने में जुट गये हैं। हालात तो यहां तक पहुंच गये कि हरे और भगवां के बाद अब नीले और भगवां को भी विरोधी खेमों में खडा कर दिया गया है ताकि बांटो और राज्य करो की आक्रान्ता नीति एक बार फिर सफलता का परिणाम दे सके। मीर जाफर, मीर कासिम और जयचन्दों की जमातें पर्दे के पीछे से अपने आकाओं की कदमपोशी करने में जुटीं हैं। यह स्लीपर सेल अपनी ही डाली को काटने में जुटे हैं। हालात तो यहां तक पहुंच गये हैं कि इन देशी गद्दारों को अपने आकाओं के विदेशी लाडलों की भी चमचागिरी करने के लिए बाध्य होना पड रहा है। विलायती शिक्षा लेकर लौटने वाले इन लाडलों को सोने के पालने में बैठकर चांदी की चम्मच से चटनी वालों की एक लम्बी फौज परिवार के दबदबे के कारण विरासत में मिल जाती है। आंकडे गवाह हैं कि देश के 54 प्रतिशत जन्मजात नेताओं को लाडले विदेशों में अध्ययन कर रहे हैं। सात समुन्दर पार की संस्कृति, संस्कार और शिक्षा में रचे बसे इन नवनिहालों को सत्ता, सुख और संसाधन का अम्बार पहली सांस के साथ ही मिल जाता है। संघर्षपूर्ण जीवन की कठिनाइयों से व्यवहारिक वास्ता न होने के कारण उन्हें हमेशा ही सावन का हरा ही सूझता है। देश के आंतरिक हालातों की समीक्षा से प्राप्त होने वाले परिणामों को सुखद कदापि नहीं कहा जा सकता। देश के प्रधानमंत्री की कर्मठता, कुशलता और कार्यपद्धति पर समूचा देश गर्व कर सकता है परन्तु उनकी टीम के अनेक नायकों पर भ्रष्टाचार, तानाशाही और समाज विरोधी कृत्य करने के अनगिनत आरोप लग रहे हैं। अनावश्यक तुष्टीकरण, मुफ्तखोरी की व्यवस्था और विभाजनकारी नियमों के इस सैलाब को रोके बिना राष्ट्रीय एकता की कल्पना करना भी एक बेबकूफकाना बचपना ही होगा। ईमानदाराना बात तो यह है कि समाज में सभी विभाजनकारी बेडियां पूरी तरह से टूट चुकीं थी परन्तु चन्द मंचखोर, पदखोर, अहंकारखोर लोगों ने लालच, लोभ और लाभ का गुड फैंककर मुफ्तखोरों को चीटियां बना दिया है। ऐसे में यदि देश का आम आवाम स्वविवेक के सहारे चिन्तन करे तो उसे आने वाले काले काल के ठहाके स्पष्ट सुनाई देंगे। समाज के अन्तिम छोर पर बैठे व्यक्ति को भी अपने चिन्तन को नई धार देना पडेगी, तभी देश, देशवासी और देश का सम्मान स्थापित रह सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

