Saturday, January 31, 2026
व्हाट्सएप पर हमसे जुड़ें

जब मौन ही सबसे बड़ा अपराध बन जाए

लेखक: लक्ष्मीकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

हस्तिनापुर: सत्ता, धर्म और टाला गया न्याय

हस्तिनापुर केवल एक प्राचीन राज्य नहीं था। यह शासन-व्यवस्था का प्रतीक था—जहाँ सत्ता सर्वोच्च थी, धर्म बहस का विषय था, और न्याय हमेशा टाल दिया जाता था। द्रौपदी का चीरहरण किसी व्यक्तिगत दुर्भावना का परिणाम नहीं था; यह मौन, निष्क्रियता और नैतिक साहस की कमी का परिणाम था।

सभा और शासन-व्यवस्था उस समय सर्वोच्च शक्ति थे। आज वही हमारे सामने अलग रूपों में मौजूद हैं—सरकार, संसद, न्यायपालिका, प्रशासन और मीडिया। सवाल वही हैं; फर्क सिर्फ इतना है कि पहले मौन स्पष्ट था, अब वह शब्दों, नियमों और प्रक्रियाओं के पर्दे में छिपा रहता है।

भीष्म: पद की मर्यादा बनाम नैतिक साहस

भीष्म उस शासन-व्यवस्था का अनुभवी स्तंभ थे। उन्होंने देखा कि सभा में अन्याय हो रहा है, पर शपथ और पद की मर्यादा ने उन्हें चुप रख दिया। आज भी संवैधानिक पदों पर बैठे लोग यही करते हैं—अन्याय को पहचानते हुए ‘सीमाओं’ का हवाला देते हैं और चुप रहते हैं। यही मौन शासन की आत्मा को खोखला कर देता है।

द्रोणाचार्य: ज्ञान बिना निर्णय का साहस

द्रोणाचार्य के पास ज्ञान, शिक्षा और नीति सब कुछ था, लेकिन निर्णय का साहस नहीं। राजऋण और निजी भय ने उनकी वाणी को रोक दिया। आज के विशेषज्ञ और अधिकारी भी इसी स्थिति में हैं—सब जानते हैं, पर बोलने का जोखिम नहीं उठाते। जब ज्ञान सत्ता का सहायक बन जाए और विवेक पीछे छूट जाए, तो शासन खोखला हो जाता है।

कृपाचार्य: खतरनाक तटस्थता

कृपाचार्य का तटस्थ दृष्टिकोण सबसे खतरनाक था—न समर्थन में, न विरोध में। आज यह ‘संतुलन’, ‘दोनों पक्ष’ या ‘प्रक्रिया’ की भाषा में सामने आता है—और अक्सर सत्ता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।

दुर्योधन–दुःशासन: सत्ता और हिंसा का चेहरा

दुर्योधन और दुःशासन सत्ता और हिंसा का चेहरा थे। जब सत्ता स्वयं को कानून से ऊपर मानने लगे, तो प्रशासन अत्याचार का औज़ार बन जाता है। यह खतरा किसी भी समय, किसी भी लोकतंत्र में मौजूद रहता है।

सुरक्षित कौन? प्रश्न पूछने वाले या चुप रहने वाले

हस्तिनापुर की सबसे बड़ी कमजोरी थी—उसने प्रश्न पूछने वालों को नहीं, चुप रहने वालों को सुरक्षित रखा। यही प्रवृत्ति आज भी दिखाई देती है। सच बोलने वाला असुविधाजनक बन जाता है, मौन रहने वाला विश्वसनीय।

कृष्ण: जब व्यवस्था विफल हो जाए

कृष्ण उस सभा का हिस्सा नहीं थे, लेकिन धर्म का प्रतिनिधित्व उन्हीं के माध्यम से हुआ। जब शासन पूरी तरह विफल हो जाए, तब समाज की अंतरात्मा—स्वतंत्र न्यायपालिका, निर्भीक मीडिया और जागरूक नागरिक—अंतिम सहारा बनती है… यदि उन्हें बोलने दिया जाए।

आज की संस्थाएँ और मौन की नई परिभाषा

आज मीडिया का परिदृश्य मिश्रित है। कुछ प्लेटफ़ॉर्म निष्पक्षता और सत्य के लिए प्रतिबद्ध हैं, पर कई सत्ता दबाव, विज्ञापन और सोशल मीडिया ट्रेंड के कारण स्वयं सेंसर बन जाते हैं।

संवैधानिक संस्थाएँ—न्यायपालिका, चुनाव आयोग, लोकपाल—स्वतंत्र हैं, पर कई बार राजनीतिक दबाव और प्रक्रिया की जटिलताओं के कारण प्रभावहीन दिखती हैं। प्रशासन नियमों और आदेशों में उलझकर वास्तविक न्याय देने में असमर्थ रह जाता है।

परिणामस्वरूप, लोकतंत्र में जनता का भरोसा कमजोर होता है, और मौन को सुविधा और तटस्थता का नाम दे दिया जाता है।

महाभारत की चेतावनी

महाभारत का युद्ध सत्ता के लोभ से नहीं, शासन की नैतिक विफलता और मौन से उत्पन्न हुआ। यह हमें चेतावनी देता है—जब अन्याय को समय रहते नहीं रोका जाता, तो टकराव अपरिहार्य है।

आज का भारत और हमारा चुनाव

आज का भारत हस्तिनापुर बने या न बने, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी शासन-व्यवस्था प्रश्नों से डरती है या उन्हें सुनने का साहस रखती है।

इतिहास में सबसे बड़ा अपराध केवल अपमान नहीं था—उस अपमान को संभव बनाने वाला मौन ही असली अपराध था।

📲 ताज़ा अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सएप चैनल को फॉलो करें – Web Varta

ये भी पढ़ें: ‘कालनेमि’ कौन? धर्म, सत्ता और संत समाज के बीच गहराता वैचारिक संघर्ष

Author

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img
spot_img

Latest

spot_img
spot_img

More articles

spot_img