-तनवीर जाफ़री- 
28 फ़रवरी 2026 को इस्राईल और अमेरिका ने एक “संयुक्त अभियान” चलाकर ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई को तेहरान में किये गये एक बड़े हवाई हमले में शहीद कर दिया था। ये हमले ख़ामनेई के रिहाइशी कंपाउंड और उस समय चल रही डिफ़ेन्स काउंसिल मीटिंगसहित और कई ठिकानों पर एक साथ हुए थे।अमेरिका -इस्राईल द्वारा ईरान पर युद्ध थोपने के पहले ही दिन हुये इस हमले में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई के अलावा 11अन्य प्रमुख ईरानी अधिकारी व नेता शहीद हो गये थे। युद्ध थोपने के पहले ही दिन और पहले ही आक्रमण में ख़ामनेई को शहीद किये जाने के पीछे अमेरिका -इस्राईल की यही रणनीति थी कि ख़ामनेई के बाद ईरान का नेतृत्व बिखर जायेगा और अमेरिका -इस्राईल की ईरान में सत्ता परिवर्तन किये जाने व शाह की संतान को ईरानी सत्ता पर थोपने की उनकी दीर्घकालीन नापाक मंशा पूरी हो जाएगी। परन्तु आयतुल्लाह ख़ामनेई की शहादत के बाद का ईरान तो इतना एकजुट,मज़बूत,सक्षम व उत्साही नज़र आया जिसकी दुनिया कल्पना भी नहीं कर सकती थी।
ईरानी सरकार ने 1 मार्च को ख़ामनेई की मौत की पुष्टि की और पूरे देश में शोक घोषित किया। उसके बाद एक तरफ़ तो ईरान व ईरानी सत्ता को अस्थिर करने की ग़रज़ से ईरान पर दुश्मन की भारी बमबारी जारी रही दूसरी तरफ़ ईरान ने भी ख़ामनेई की शहादत के बाद अमेरिका व इस्राईली हितों की रक्षा करने वाले लगभग 12 देशों परआक्रमण किये। इनमें खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी बेस और अन्य सैन्य ठिकाने शामिल थे। आश्चर्य की बात तो यह है कि पूरा ईरान इस दौरान अपने सर्वोच्च नेता की शहादत के ग़म में भी डूबा रहा,साथ ही मिनाब में स्कूल पर हुये हमले व अन्य जगहों पर हो रही अमेरिका व इस्राईली बमबारी का भी सामना करता रहा और इसी के साथ अपनी रक्षा भी बख़ूबी करते हुये अपने दुश्मनों व उनके हितैषियों को भी पूरे सलीक़े के साथ सबक़ सिखाता रहा।
इसके पीछे सैय्यद अली ख़ामनेई के त्याग,उनकी दूरदृष्टि,ईमानदारी,सादगी व उनके बलिदान का सबसे महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है। ग़ौरतलब है कि सैय्यद अली ख़ामनेई को 3 जून 1989 को आयतुल्लाह रुहुल्लाह ख़ोमैनी की मृत्यु के बाद ईरान का “कार्यवाहक सर्वोच्च नेता” निर्वाचित किया गया था। दो महीने बाद 6 अगस्त 1989 को ईरानी विशेषज्ञों की सभा ने उन्हें स्थायी “सर्वोच्च नेता” के रूप में आधिकारिक तौर से चुन लिया। गोया आज का ईरान इन्हीं आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई की लगभग 37 वर्षों की दूरदर्शिता से निर्मित किया गया वह देश है जिसने अमेरिका व इस्राईल जैसे विश्व के सबसे आक्रामक व नरसंहारक देशों के पसीने छुड़ा दिये।
गत 9 अप्रैल से ख़ामनेई की शहादत के बाद उनका चालीसवां (शोक) मनाने का सिलसिला शुरू हुआ। यह चालीसवां केवल ईरान में ही नहीं मनाया गया बल्कि दुनिया के अनेक देशों के अनेक शहरों में 9 अप्रैल के बाद इनकी याद में बड़ी बड़ी सभाएं की गयीं और यह सिलसिला अभी भी जारी है। जीवन की सादगी, उनकी सीख, शिक्षा,समर्पण व त्याग ने ख़ामनेई को उस बुलंदी पर पहुंचा दिया कि उन पर आंसू बहाने वालों में केवल शिया समाज के लोग ही शामिल नहीं हुये बल्कि बड़ी संख्या में ईसाई,सुन्नी,हिन्दू,सिख,बौद्ध, जैन आदि सभी समुदायों के लोग अलग अलग जगहों पर शामिल हुये। मैं तुलना तो नहीं करता परन्तु यह बात दावे के साथ कहता हूँ कि करबला के शहीदों के चालीसवें के सिवाय और किसी अन्य व्यक्ति के चालीसवें अथवा सोग के अवसर पर इतने अधिक देशों व शहरों में इतने बड़े पैमाने पर इतने अधिक आयोजन होते मैंने पहले कभी नहीं देखा-सुना। 3 जून 1989 को ईरानी क्रांति के नेता आयतुल्लाह रुहुल्लाह ख़ोमैनी की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार में भी ईरान के विभिन्न हिस्सों से करोड़ों लोगों ने शिरकत की थी। अपनी मृत्यु से पूर्व ख़ोमैनी कई वर्षों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे।अंतिम दिनों में उन्हें आंतरिक रक्तस्राव के इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था। गहन जाँच के बाद उन्हें कैंसर और दिल संबंधी समस्याओं से पीड़ित बताया गया और केवल 11 दिनों तक अस्पताल में रहने के दौरान उन्हें दिल के कई दौरे पड़े।आख़िरकार 12वें दिन उनकी मृत्यु हो गयी । ख़ोमैनी के अंतिम संस्कार को भी इतिहास के सबसे बड़े अंतिम संस्कारों में से एक माना जाता है परन्तु वैश्विक स्तर पर सभी धर्मों व समुदायों के लोगों द्वारा उनका भी अंतिम सोग अर्थात चालीसवां इस स्तर पर नहीं मनाया गया था।
इसकी असल वजह है आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई का 86 वर्ष की आयु में शहीद होना। और वह भी अमेरिका व इस्राईल जैसे राक्षसीय कृत्य को अंजाम देने वाले मानवता के दुश्मन समझे जाने वाले देशों के मुक़ाबले डटकर खड़े रहने और सच्चाई व अपने अधिकारों के लिये डटकर मुक़ाबला करने की सीख देते हुये शहीद होना। इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में ख़ामनेई की शहादत को दुनिया इसलिये भी याद रखेगी कि वे वास्तव में करबला से प्रेरणा लेने वाले एक ऐसे सच्चे मुजाहिद थे जिन्होंने अपने दुश्मन की ताक़त उसकी धमकियों यहाँ तक की अमेरिका के चलते ईरान पर चले आ रहे चार दशकों के अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों की भी परवाह न करते हुए भी एक ऐसे ईरान का निर्माण किया जिसकी गिनती आज विश्व की महाशक्तियों में होने लगी है। यदि ख़ामनेई शहीद न होते और अमेरिका ने यह युद्ध थोपा न होता तो आज ईरान – अमेरिका व इस्राईल की वास्तविक ताक़त का अंदाज़ा भी दुनिया को न होता। गोया ख़ामनेई की शहादत ने अमेरिका व इस्राईल सहित कई देशों को बेनक़ाब कर दिया जो क्रूरता कायरता व मानवता के बड़े मुजरिम हैं।
हमारे देश भारत में भी महात्मा गाँधी अपने जीवन में शायद उतने प्रभावी व प्रासंगिक नहीं रहे होंगे जितने कि वे शहीद होने के बाद हुये। उनकी हत्या करने के बाद न केवल उनकी सोच,सीख व आदर्शों को ‘गांधीवाद’ व ‘गाँधी दर्शन’ का नाम मिला बल्कि देश में साम्प्रदायिकतावादियों का चेहरा भी बेनक़ाब हो गया। आज गाँधी को भी उनके सत्य व अहिंसा के सिद्धांतों के लिये याद किया जाता है। यह भी अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि महात्मा गाँधी भी करबला की घटना से प्रभावित थे तथा कई जगहों पर उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन के त्याग, सम्मान की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध उनके अडिग होकर खड़े रहने की सराहना की। इमाम हुसैन का संदेश उनके लिए मानवता का संदेश था। और आज उसी करबला और शहीद करबला हज़रत हुसैन के बताये हुये मार्ग पर चलते हुये ख़ामेनेई ने भी शहादत को गले लगाकर अपने आपको अमर कर दिया। निःसंदेह शहादत अमरत्व की ओर ले जाती है।
(लेखक वेब मीडिया में अतिसक्रिय व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


