हरदोई, लक्ष्मीकांत पाठक | वेब वार्ता
मानव समाज की स्थिरता केवल भौतिक प्रगति पर नहीं, बल्कि उसके नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और पारिवारिक मर्यादाओं की दृढ़ता पर आधारित होती है। किंतु वर्तमान समय में भारतीय समाज एक गहरे नैतिक संक्रमण से गुजरता प्रतीत हो रहा है, जहां संबंधों की पवित्रता पर स्वार्थ, वासना और उच्छृंखलता का कुहासा छाता जा रहा है।
समाचारों में झलकता सामाजिक संकट
आज समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और डिजिटल मीडिया में प्रेम-प्रसंग से जुड़े अपराधों की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। कहीं प्रेम में असफलता हत्या का कारण बन रही है, तो कहीं पत्नी प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर रही है। कहीं पुत्र पारिवारिक अपमान से आक्रोशित होकर अमानवीय कृत्य कर बैठता है, तो कहीं पति संदेह के चलते पत्नी की जान ले लेता है। ये घटनाएं केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक पतन की भयावह तस्वीर हैं।
प्रेम का बदलता स्वरूप
प्रेम, जो कभी त्याग, धैर्य और मर्यादा का प्रतीक माना जाता था, आज अनेक स्थानों पर अधिकार, स्वामित्व और उपभोग का माध्यम बनता जा रहा है। आत्मिक समर्पण के स्थान पर अब उसमें वासना और क्षणिक आकर्षण का प्रभुत्व बढ़ रहा है। जब संबंध उत्तरदायित्व और सामाजिक मर्यादा से विमुख हो जाते हैं, तब उनका अंत प्रायः विघटन और विनाश में होता है।
ग्रामीण समाज पर भी असर
यह प्रवृत्ति अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही है। ग्रामीण समाज, जो कभी पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं का गढ़ माना जाता था, वहां भी यह विकृति गहराने लगी है। परिवारों का संतुलन बिगड़ रहा है और नई पीढ़ी असुरक्षा, मानसिक द्वंद्व और आक्रोश के वातावरण में पलने को विवश हो रही है।
पतन के प्रमुख कारण
- व्यक्ति में आत्मसंयम का अभाव
- परिवार की कमजोर होती संस्कारात्मक भूमिका
- समाज की मौन निष्क्रियता
- भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी सोच
- कानून की सीमित भूमिका
इन सभी कारणों का संयुक्त प्रभाव समाज को भीतर से कमजोर कर रहा है। कानून अपराधियों को दंड दे सकता है, किंतु वह मनुष्य के अंतःकरण में संयम, संवेदना और विवेक का संचार नहीं कर सकता।
सामाजिक विश्वास का क्षरण
वर्तमान स्थिति में सामाजिक विश्वास का ताना-बाना कमजोर पड़ता जा रहा है। संबंध, जो कभी जीवन की ऊर्जा और सुरक्षा का स्रोत थे, अब अनेक मामलों में जीवन के विनाश का कारण बनते जा रहे हैं। यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक है।
पुनर्जागरण का मार्ग
इस संकट से मुक्ति का मार्ग बाह्य नियंत्रण में नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण में निहित है। इसके लिए आवश्यक है कि समाज में पुनः संस्कारों की स्थापना हो, परिवारों में संवाद की संस्कृति विकसित हो और युवाओं में आत्मसंयम तथा नैतिक चेतना को सुदृढ़ किया जाए।
निष्कर्ष
जब तक व्यक्ति अपने भीतर मर्यादा, उत्तरदायित्व और आत्मनियंत्रण का दीप प्रज्वलित नहीं करेगा, तब तक समाज का संतुलन पुनः स्थापित नहीं हो सकेगा। प्रेम को वासना और स्वार्थ से मुक्त कर पुनः त्याग, सम्मान और विश्वास का आधार बनाना ही आज की सबसे बड़ी सामाजिक आवश्यकता है। जब यह चेतना जागृत होगी, तभी सामाजिक पुनर्जागरण का स्वर्णिम प्रभात संभव हो सकेगा।
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