लखनऊ, लक्ष्मीकांत पाठक | वेब वार्ता
उत्तर प्रदेश की राजनीति में “कालनेमि” अब केवल एक पुराण पात्र नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म और समाज के बीच उभरता हुआ जीवंत प्रतीक बन चुका है। प्रयागराज महाकुंभ के दौरान ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद इस शब्द को नई राजनीतिक और वैचारिक परिभाषा दे गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के “कालनेमि” संबंधी वक्तव्य ने न केवल राजनीतिक हलचल बढ़ाई, बल्कि संत समाज और सत्ता के रिश्तों को भी सवालों के घेरे में ला दिया।
प्रयागराज में विवाद की शुरुआत
मौनी अमावस्या के दिन, श्रद्धा और मौन का प्रतीक दिवस, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ गंगा स्नान के लिए निकले, तभी पुलिस ने उनके रथ को रोक दिया। विवाद बढ़ा तो उन्होंने मेला प्रशासन और सरकार पर षड्यंत्र का आरोप लगाया। इसके बाद प्रशासन ने उनसे “शंकराचार्य होने का प्रमाण” मांगा — यह सवाल उठने लगा कि क्या अब आस्था को भी सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता है?
राजनीति में ‘कालनेमि’ का प्रवेश
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज विवाद के बाद कहा कि — “संत की पूंजी धर्म है, राष्ट्र उसकी चेतना।” इसी संदर्भ में उन्होंने “कालनेमि” शब्द का प्रयोग किया, जो सत्ता और साधु दोनों के संदर्भ में बहस का विषय बन गया। समाजवादी पार्टी ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाते हुए मोर्चा संभाल लिया। अखिलेश यादव ने इसे “सनातन और संत समाज के अपमान” का प्रश्न बताया और भाजपा पर तीखा प्रहार किया।
- भाजपा की वैचारिक राजनीति लंबे समय से मंदिर, संत और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित रही है।
- समाजवादी पार्टी अब “सनातन की भाषा” में अपनी राजनीतिक पहचान खोजने का प्रयास कर रही है।
- संत समाज स्वयं इस मुद्दे पर विभाजित है — कहीं समर्थन, कहीं आलोचना और कहीं गहरा मौन।
संत समाज और सत्ता के रिश्तों पर सवाल
प्रयागराज महाकुंभ, जो सदियों से आस्था और एकता का प्रतीक रहा है, अब प्रशासनिक कठोरता और राजनीतिक बयानबाज़ी के कारण विवाद का केंद्र बन गया है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने संयम दिखाते हुए संवाद की बात की, जबकि मुख्यमंत्री योगी का “कालनेमि” वाला वक्तव्य सत्ता के भीतर दृष्टिकोणों के टकराव को उजागर करता है। यह केवल धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज के बीच विश्वास की परीक्षा भी है।
निष्कर्ष: आस्था बनाम सत्ता का संघर्ष
उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय एक वैचारिक मोड़ पर खड़ी है, जहां धर्म, सत्ता और समाज के बीच सीमाएं धुंधली हो चुकी हैं। “कालनेमि” अब प्रतीक है उस संघर्ष का, जहां साधु की मर्यादा, सत्ता की नीति और जनभावना के बीच सीधा टकराव दिखता है। आने वाले चुनावों में यह विवाद न केवल राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आस्था का प्रकाश सत्ता पर भारी पड़ता है या सत्ता की छाया आस्था को ढक लेती है।
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