लक्ष्मीकान्त पाठक | वेब वार्ता
देश की वर्तमान राजनीति में हाल के दिनों में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने धर्म और सत्ता के संबंधों पर गंभीर विमर्श को जन्म दिया है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा खींची गई वैचारिक रेखा केवल असहमति का प्रतीक नहीं, बल्कि यह एक स्पष्ट संकेत है कि जब सत्ता पर प्रश्न उठते हैं, तब उसका वास्तविक स्वरूप उजागर होने लगता है।
धर्म और राजनीति के बीच खिंचती रेखा
सनातन धर्म किसी एक कालखंड या सत्ता व्यवस्था से बंधा हुआ नहीं है। यह जीवन दर्शन, आचरण और शाश्वत अनुभूति का मार्गदर्शन करता है। इसके विपरीत हिंदुत्व एक राजनीतिक संरचना के रूप में उभरा विचार है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब राजनीति स्वयं को धर्म का प्रतिनिधि घोषित करने लगती है और धर्म को सत्ता का औजार बनाने का प्रयास करती है।
इतिहास साक्षी है कि राजनीतिक व्यवस्थाएं स्थायी नहीं होतीं। रूस हो या अमेरिका—हर शक्ति का उत्कर्ष और पतन समय के साथ तय है। लेकिन धर्म, विशेषकर सनातन परंपरा, सत्ता परिवर्तन से परे अपनी निरंतरता बनाए रखती है। ऐसे में जब अस्थायी राजनीतिक प्रयोग धर्म से जुड़ते हैं, तो दीर्घकालिक क्षति की आशंका स्वाभाविक है।
शंकराचार्य परंपरा क्यों असहज करती है सत्ता को
शंकराचार्य परंपरा सनातन धर्म की आत्मा की संरक्षक मानी जाती है। यह सत्ता को वैधता का प्रमाणपत्र देने के बजाय उससे प्रश्न करती है। यही कारण है कि यह परंपरा कई बार राजनीतिक शक्तियों के लिए असहज बन जाती है। जब तक शंकराचार्य व्यवस्था सक्रिय और प्रभावी रहती है, तब तक धर्म को किसी भी राजनीतिक ढांचे में पूरी तरह समाहित करना आसान नहीं होता।
2014 के बाद उभरती प्रवृत्तियां
बीते एक दशक में कुछ ऐसी प्रवृत्तियां सामने आई हैं, जिन्होंने समाज और धर्म दोनों को प्रभावित किया है। मीडिया के माध्यम से कृत्रिम धार्मिक व्यक्तित्वों का निर्माण एक गंभीर प्रश्न बनकर उभरा है। जैसे ही कोई सवाल उठता है, आलोचना को ‘धार्मिक अपमान’ का रूप दे दिया जाता है, जिससे संवाद की संभावनाएं समाप्त होने लगती हैं।
- मीडिया के जरिए नए-नए धार्मिक चेहरों का त्वरित निर्माण
- आलोचना को धार्मिक भावना आहत करने का मुद्दा बनाना
- युवाओं में विदेशी नशों, विशेषकर स्मैक, का बढ़ता प्रभाव
- इन समस्याओं पर राजनीतिक और प्रशासनिक चुप्पी
नशा, युवावर्ग और सामाजिक जिम्मेदारी
युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति केवल सामाजिक विफलता नहीं है, बल्कि यह उस चुप्पी का परिणाम भी है, जो नीति निर्धारण के स्तर पर दिखाई देती है। जब समाज का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाकर प्रतीकों और भावनात्मक नारों में उलझा दिया जाता है, तब ऐसी समस्याएं गहराती चली जाती हैं।
अविमुक्तेश्वरानंद की पहल का अर्थ
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा उठाया गया कदम किसी व्यक्तिगत विरोध तक सीमित नहीं है। यह सनातन धर्म को राजनीतिक प्रयोगशाला बनने से बचाने का प्रयास है। यह याद दिलाता है कि धर्म का कार्य सत्ता को नैतिक दिशा देना है, न कि सत्ता के हर निर्णय पर मौन स्वीकृति प्रदान करना।
निष्कर्ष
जब धर्म सत्ता से प्रश्न करने का साहस करता है, तभी लोकतंत्र और नैतिकता दोनों की रक्षा संभव होती है। शंकराचार्य परंपरा का यही मूल स्वरूप है—वह सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि उसका नैतिक संतुलन है। अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा खींची गई यह रेखा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि धर्म सत्ता का औजार नहीं, बल्कि सत्ता की सीमाएं तय करने वाला विवेक होना चाहिए।
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