दबंगों ने छीनी अनाथ बच्ची की जमीन – प्रशासन की मूकदर्शिता पर गंभीर प्रश्न

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एटा, सुनील यादव (वेब वार्ता)। जनपद एटा के नगला पवल गांव में एक नाबालिग, 16 वर्षीय छाया, और उसके आर्थिक तंगी से जूझते परिवार की किस्मत में चढ़ गई निराशा की नई परत। सरकार द्वारा माता-पिता की मृत्यु और गरीबी की पीड़ा के बीच आवंटित 6 बीघा सरकारी जमीन, जिसे न्याय की आशा बनी हुई थी, अब दबंगों के जबरन कब्जे के शिकार बन गई है। प्रशासन की मिलीभगत और न्याय से इनकार छाया का आरोप है कि प्रशासन, जो अपने कर्तव्यों से दूर हटकर दबंगों के दबदबे का ही समर्थन करता दिख रहा है, नाबालिग को उसके हक दिलाने में कोई कदम नहीं उठा रहा। प्रशासन की मूकदर्शिता ने साफ तौर पर सरकारी तंत्र की निष्क्रियता और मिलीभगत का पर्दाफाश कर दिया है। जबकि कानून व्यवस्था और न्याय के नारे ऊँचे किए जाते हैं, वहीं ज़मीन के असली हकदार से गाटा संख्या 148 की जमीन न देकर उसे दूसरी जगह भेजने का प्रयास किया जा रहा है।

दबंगई का अंधेरा और प्रशासन की अनदेखी

छाया ने स्पष्ट किया कि उसके परिवार की आर्थिक दुर्बलता का फायदा उठाते हुए दबंगों ने न केवल जमीन पर अनाधिकृत कब्जा जमाने की कोशिश की है, बल्कि प्रशासन भी इन दबंगों के पक्ष में खड़ा होकर न्याय की पुकार को अनसुना कर रहा है। यह स्थिति समाज में फैले दबंगई और सामाजिक शोषण का एक कड़ा उदाहरण है, जहाँ कमजोर वर्गों की सुरक्षा करने के बजाय सरकारी तंत्र अपनी जिम्मेदारियों से कतराता दिखता है।

न्याय की मांग

प्रशासन से जवाबदेही की पुकार पीड़िता के परिवार को अब डर और भय के साये में जीना पड़ रहा है। छाया और उसके परिवार की ओर से प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर गाटा संख्या 148 पर उनके हक का कब्जा दिलाने की मांग उठाई जा रही है। यह मांग न केवल व्यक्तिगत हक की बहाली की है, बल्कि सरकारी नीतियों में व्याप्त भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मिलीभगत के खिलाफ एक कड़ा संदेश भी देती है।

सरकारी दलदल

एक शर्मनाक विफलता इस घटना ने यह सवाल उठाया है कि क्या सरकार और प्रशासन वाकई समाज के सबसे कमजोर तबके की सुरक्षा में सक्षम हैं? दबंगों के दबदबे को रोकने के बजाय, प्रशासन ने अपनी मूकदर्शिता से इन अपराधों को बढ़ावा दिया है। यह एक ऐसी शर्मनाक विफलता है जो सरकारी तंत्र के भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार और निष्क्रियता को उजागर करती है। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जब तक प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की भावना को मजबूत नहीं किया जाता, तब तक समाज के कमजोर वर्गों के साथ अन्याय चलता रहेगा। सरकारी तंत्र से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करें – परंतु आज ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता के दलदल में डूबा प्रशासन अपने ही वादों से मुंह मोड़ रहा है।

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