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नीट 2026 पेपर लीक: शिक्षा व्यवस्था पर कलंक और छात्रों के टूटते सपने

-कांतिलाल मांडोत- Kantilal Mandot
भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल एक परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य, परिवारों की उम्मीदों और वर्षों की मेहनत का परिणाम होती हैं। मेडिकल जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्र में प्रवेश पाने के लिए छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं। कई छात्र गांवों की कठिन परिस्थितियों से निकलकर, आर्थिक अभाव झेलकर और मानसिक दबाव सहकर परीक्षा की तैयारी करते हैं। ऐसे में जब नीटजैसी राष्ट्रीय परीक्षा में पेपर लीक, सॉल्वर गैंग और करोड़ों की डील का खुलासा होता है, तो यह केवल एक परीक्षा घोटाला नहीं रह जाता, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
भारत पहले भी कई बड़े पेपर लीक घोटाले देख चुका है। उत्तर प्रदेश शिक्षक भर्ती परीक्षा, रेलवे भर्ती परीक्षा, राजस्थान शिक्षक भर्ती, मध्यप्रदेश व्यापमं घोटाला और 2024 के नीट  विवाद ने पहले ही युवाओं का भरोसा कमजोर कर दिया था। 2024 में बिहार और झारखंड में पेपर लीक के आरोप सामने आए थे। कई गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन तब भी पूरी परीक्षा रद्द नहीं हुई। छात्रों के मन में यह सवाल रह गया कि क्या मेहनत का कोई मूल्य बचा है? अब 2026 में फिर वही कहानी सामने आई है, लेकिन इस बार मामला और भी गंभीर दिखाई देता है।
नीट 2026 परीक्षा रद्द होने के पीछे बिहार और राजस्थान से सामने आए खुलासों ने पूरे देश को झकझोर दिया। बिहार के नालंदा में पुलिस ने जिस सॉल्वर गैंग का भंडाफोड़ किया, उसने यह साबित कर दिया कि परीक्षा माफिया कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुका है। 50 से 60 लाख रुपये में एक सीट की डील होना केवल अपराध नहीं, बल्कि शिक्षा के व्यवसायीकरण का भयावह चेहरा है। यह गिरोह असली अभ्यर्थियों की जगह सॉल्वर बैठाने की तैयारी कर रहा था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इसका मास्टरमाइंड एक मेडिकल कॉलेज का छात्र निकला। जिस युवा को भविष्य में डॉक्टर बनकर लोगों की जान बचानी थी, वही शिक्षा व्यवस्था को संक्रमित करने में लगा था।
राजस्थान में सामने आए “हाथ से लिखे गेस पेपर” ने इस पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया। जांच में पता चला कि परीक्षा से पहले छात्रों तक ऐसे प्रश्न पहुंच चुके थे, जिनमें से बड़ी संख्या असली परीक्षा में आई। यदि यह केवल संयोग माना जाए, तब भी इतने बड़े स्तर पर सवालों का मिलान होना सामान्य नहीं कहा जा सकता। इससे यह आशंका और मजबूत हो जाती है कि परीक्षा प्रणाली के भीतर कहीं न कहीं गंभीर सेंध लगी है।
सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों छात्रों का हुआ है जिन्होंने ईमानदारी से तैयारी की थी। करोड़ों परिवारों ने अपने बच्चों को कोचिंग दिलाने के लिए जमीन बेची, कर्ज लिया और अपनी जरूरतों को त्याग दिया। कई छात्र दिन में 12-14 घंटे पढ़ाई करते हैं। वे सामाजिक जीवन छोड़ देते हैं, मनोरंजन छोड़ देते हैं और केवल एक लक्ष्य पर केंद्रित रहते हैं। लेकिन जब परीक्षा रद्द होती है, तो उनकी महीनों की मेहनत और मानसिक संतुलन दोनों पर गहरा आघात पड़ता है।
एक छात्र की मानसिक स्थिति को समझना बेहद जरूरी है। परीक्षा की तैयारी पहले ही तनाव, चिंता और भय से भरी होती है। छात्र लगातार तुलना, प्रतियोगिता और असफलता के डर में जीते हैं। जब पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो उनके भीतर यह भावना जन्म लेती है कि मेहनत से ज्यादा महत्व पैसे और पहुंच का है। यह भावना युवाओं को भीतर से तोड़ देती है। कई छात्र अवसाद में चले जाते हैं। कुछ खुद को असफल मानने लगते हैं। कई बार यही मानसिक दबाव आत्मघाती विचारों तक पहुंच जाता है।
2020 में मध्यप्रदेश की छात्रा विधि सूर्यवंशी का मामला आज भी लोगों को झकझोरता है। गलत रिजल्ट आने के बाद उसने आत्महत्या कर ली थी, जबकि बाद में ओएमआर जांच में उसके अंक कहीं अधिक निकले। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि परीक्षा संबंधी त्रुटियां केवल तकनीकी गलती नहीं होतीं, बल्कि किसी परिवार के जीवन का विनाश बन सकती हैं। जब एक छात्र वर्षों की मेहनत के बाद भी व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर पाता, तो यह केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि राष्ट्रीय असफलता है।
नीट परीक्षा रद्द होने से प्रशासनिक और आर्थिक नुकसान भी बहुत बड़ा हुआ है। देशभर में लाखों छात्रों के लिए परीक्षा केंद्र बनाए गए थे। सुरक्षा व्यवस्था, परिवहन, प्रश्नपत्र छपाई, निगरानी, तकनीकी प्रबंधन और कर्मचारियों की तैनाती पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। अब दोबारा परीक्षा कराने में फिर उतना ही खर्च होगा। यह पैसा आखिरकार जनता के टैक्स से आता है। यानी भ्रष्टाचार और लापरवाही का बोझ अंततः देश की जनता ही उठाती है।
इतने बड़े स्तर पर परीक्षा आयोजित होने के बावजूद यदि पेपर लीक, सॉल्वर गैंग और फर्जीवाड़ा रोका नहीं जा सका, तो यह हमारी प्रशासनिक निगरानी की गंभीर विफलता को दर्शाता है। प्रश्न यह उठता है कि जब डिजिटल निगरानी, बायोमेट्रिक सिस्टम और साइबर सुरक्षा जैसे आधुनिक साधन मौजूद हैं, तब भी परीक्षा माफिया इतनी आसानी से सक्रिय कैसे हो जाते हैं? क्या व्यवस्था के भीतर कहीं मिलीभगत है? क्या निगरानी एजेंसियां केवल औपचारिकता निभा रही हैं? यदि हर वर्ष ऐसी घटनाएं दोहराई जा रही हैं, तो इसका अर्थ है कि सुधार केवल कागजों तक सीमित हैं।
यह स्थिति देश की प्रतिभा के लिए भी खतरनाक है। जब योग्य छात्र निराश होकर पीछे हटने लगते हैं और धनबल या अपराध के जरिए लोग आगे बढ़ने लगते हैं, तब पूरे समाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है। चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यदि गलत तरीके से प्रवेश पाने वाले छात्र डॉक्टर बनेंगे, तो इसका असर सीधे जनता की जान पर पड़ेगा। एक अयोग्य डॉक्टर केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि अनगिनत जिंदगियों की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
आज आवश्यकता केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली के पुनर्गठन की है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर वितरण तक हर स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। परीक्षा केंद्रों की निगरानी पूरी तरह तकनीक आधारित होनी चाहिए। पेपर तैयार करने वाले विशेषज्ञों और प्रिंटिंग सिस्टम की सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर की होनी चाहिए। साथ ही, ऐसे मामलों में त्वरित न्याय और कठोर दंड भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई इस तरह के अपराध का साहस न कर सके।
सरकार और एजेंसियों को यह समझना होगा कि हर बार परीक्षा रद्द कर देना समाधान नहीं है। इससे छात्रों का विश्वास और कमजोर होता है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी मजबूत व्यवस्था बनाई जाए जिसमें परीक्षा शुरू होने से पहले ही लीक की संभावना समाप्त हो जाए। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास कायम रखना किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।
नीट 2026 विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि समय रहते कठोर और पारदर्शी सुधार नहीं किए गए, तो देश के युवाओं का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। यह केवल परीक्षा का संकट नहीं, बल्कि भविष्य का संकट है। करोड़ों छात्रों की आंखों में जो सपने हैं, उन्हें बचाने के लिए व्यवस्था को अब जागना ही होगा। क्योंकि जब मेहनत हारने लगे और भ्रष्टाचार जीतने लगे, तब किसी भी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तम्भकार है)

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