राजघाट पहुंचे अरविंद केजरीवाल, सत्याग्रह का ऐलान; अदालत में पेश न होने का निर्णय

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (वेब वार्ता)। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया मंगलवार को राजघाट पहुंचे, जहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उनके साथ नेता प्रतिपक्ष आतिशी भी मौजूद रहीं। इस दौरान दोनों नेताओं ने अपने न्यायिक मामले को लेकर सत्याग्रह का ऐलान किया।

इससे पहले केजरीवाल और सिसोदिया ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि वे अब इस मामले में न तो स्वयं अदालत में पेश होंगे और न ही उनके वकील पैरवी करेंगे। उन्होंने अपने इस निर्णय को “सत्याग्रह” का नाम दिया है।

केजरीवाल ने कहा कि वे देश की न्याय प्रणाली का सम्मान करते हैं, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बन गई हैं कि उन्हें यह कदम उठाना पड़ रहा है। उन्होंने इसे बेहद संवेदनशील मामला बताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी सभी बातें पत्र में विस्तार से लिखी हैं।

अपने चार पृष्ठों के पत्र में केजरीवाल ने कहा कि यह निर्णय उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया है और इसके परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इससे उनके कानूनी हित प्रभावित हो सकते हैं, फिर भी वे अपने फैसले पर कायम रहेंगे। साथ ही उन्होंने यह अधिकार सुरक्षित रखा है कि वे न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख कर सकते हैं।

पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह सिद्धांत का हवाला देते हुए अपने कदम को उसी परंपरा से जोड़ा।

वहीं, सिसोदिया ने भी न्यायमूर्ति शर्मा को लिखे पत्र में कहा कि उनकी ओर से भी कोई वकील अदालत में पेश नहीं होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है और इसलिए सत्याग्रह ही एकमात्र विकल्प बचा है।

गौरतलब है कि यह मामला आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा दायर अपील पर दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है। इससे पहले केजरीवाल ने न्यायमूर्ति शर्मा से मामले से अलग होने का अनुरोध किया था, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था।

इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस छिड़ गई है। एक ओर जहां इसे न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे राजनीतिक विरोध के नए रूप के तौर पर भी समझा जा रहा है।

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