नैनीताल, 28 अप्रैल (वेब वार्ता)। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली उत्पादन पर लगाए गए टैक्स को लेकर अहम फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “बिजली उत्पादन” पर टैक्स लगाने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं है, यह अधिकार केंद्र सरकार के अंतर्गत आता है।
यह फैसला विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा दायर विशेष अपीलों पर सुनवाई के बाद दिया गया। इन कंपनियों ने राज्य सरकार द्वारा लगाए गए वाटर टैक्स को चुनौती दी थी।
मामले की सुनवाई के दौरान पूर्व मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ में मतभेद सामने आए थे, जिसके बाद इसे न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ के समक्ष संदर्भ के रूप में भेजा गया था। एकलपीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया।
प्रकरण के अनुसार, राज्य गठन के बाद उत्तराखंड सरकार ने विभिन्न कंपनियों को नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया था। इसके तहत हुए समझौते में यह तय किया गया था कि कुल उत्पादित बिजली का 12 प्रतिशत हिस्सा राज्य को निशुल्क मिलेगा, जबकि शेष बिजली अन्य राज्यों को बेची जाएगी।
इसके बाद वर्ष 2012 में राज्य सरकार ने “जल कर अधिनियम” लागू करते हुए जलविद्युत कंपनियों पर उत्पादन के आधार पर प्रति यूनिट 2 से 10 पैसे तक का टैक्स लगाया था। इस निर्णय को टीएचडीसी, एनएचपीसी सहित कई कंपनियों ने न्यायालय में चुनौती दी थी।
प्रारंभिक सुनवाई में एकलपीठ ने सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए याचिकाएं खारिज कर दी थीं और कहा था कि यह टैक्स संवैधानिक दायरे में है। हालांकि बाद में विशेष अपीलों पर पुनः सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस पर अलग दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।
न्यायालय के ताजा फैसले से जलविद्युत कंपनियों को बड़ी राहत मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय का असर राज्य की राजस्व व्यवस्था और ऊर्जा नीति पर भी पड़ सकता है।
यह फैसला न केवल उत्तराखंड बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जहां जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े कराधान के मुद्दे उठते रहे हैं।



