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भारत की शिक्षा व्यवस्था: क्या वाकई सही दिशा में बढ़ रहा है देश?

-इरशान सईद-

भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां विकास के दावे और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है।

एक ओर सरकार डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास और नई शिक्षा नीति जैसे बड़े-बड़े बदलावों की बात करती है, वहीं दूसरी ओर देश के लाखों स्कूल अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं।

सरकारी स्कूलों की स्थिति

देश के कई हिस्सों में सरकारी स्कूलों में न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही जरूरी संसाधन। कई स्कूलों में एक ही शिक्षक पूरी कक्षा को संभालता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

इसके अलावा, स्कूलों में साफ-सफाई, शौचालय और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की भी कमी देखने को मिलती है।

प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता प्रभाव

वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। बेहतर सुविधाओं और अंग्रेजी माध्यम के कारण अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं।

हालांकि, इन स्कूलों की फीस आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है, जिससे शिक्षा में असमानता और बढ़ रही है।

रटने वाली शिक्षा प्रणाली

भारत की शिक्षा व्यवस्था में अब भी रटने (रोट लर्निंग) पर ज्यादा जोर दिया जाता है। छात्रों को परीक्षा पास करने के लिए तैयार किया जाता है, न कि वास्तविक जीवन की चुनौतियों के लिए।

इस वजह से छात्रों में क्रिएटिविटी और प्रैक्टिकल स्किल्स का विकास सीमित रह जाता है।

डिजिटल शिक्षा – अवसर और चुनौती

कोविड-19 के बाद डिजिटल शिक्षा को तेजी से बढ़ावा मिला, लेकिन यह बदलाव सभी के लिए समान रूप से फायदेमंद नहीं रहा।

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिवाइस की कमी के कारण कई छात्र इस दौड़ में पीछे रह गए।

क्या है आगे की राह?

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सही तरीके से लागू होना भी जरूरी है। जब तक शिक्षा को सभी के लिए समान और सुलभ नहीं बनाया जाएगा, तब तक देश का समग्र विकास संभव नहीं है।

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