-निर्मल रानी-
मार्च 2020 में कोरोना महामारी के दौरान दुनिया के अनेक देशों में तरह तरह के अभूतपूर्व फ़ैसले लिये गये थे। प्रायः ऐसे फ़ैसलों का मक़सद कोरोना महामारी के संक्रमण को यथासंभव रोकना था। इसी दौरान पूरे विश्व में हवाई यातायात तक ठप्प हो गया था। अनेक देशों में लॉक डाउन लगा दिया गया था। कल-कारख़ाने सभी प्रकार के यातायात, व्यवसाय, उद्योग बाज़ार आदि सभी बंद कर दिये गये थे। भारत भी उन्हीं देशों में एक था जहाँ पूर्ण लॉक डाउन लगा दिया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं 24 मार्च 2020 की रात को पहले चरण के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की थी। 25 मार्च 2020 की मध्यरात्रि से लागू हुआ प्रथम चरण का यह पूर्ण लॉकडाउन पहले तो केवल 21 दिनों का बताया गया था परन्तु बाद में भी इसे कई चरणों में आगे बढ़ाया गया था। इसी पूर्ण लॉकडाउन के दौरान रेल सहित देश की सभी यातायात सुविधाओं को पूर्णतः स्थगित कर दिया गया था। कोरोना का प्रभाव कम होने के बाद भारतीय रेलवे ने 12 मई से चरणबद्ध तरीक़े से यात्री ट्रेनों को फिर से शुरू करने की योजना बनाई थी। इसके अंतर्गत सर्वप्रथम 15 विशेष ट्रेनों के द्वारा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को असम, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, जम्मू, झारखंड,कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और त्रिपुरा के प्रमुख शहरों से जोड़ा गया था। बाद में धीरे धीरे इनका विस्तार किया गया।
भारत सरकार ने इस अवसर का लाभ उठाते हुये वरिष्ठ नागरिकों को रेल यात्रा में रेल टिकट पर मिलने वाली आंशिक छूट को पूरी तरह समाप्त कर दिया था। वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली छूट को समाप्त करते समय सरकार द्वारा यह तर्क दिया गया था कि “अनावश्यक यात्रा रोकने” के लिये यह छूट समाप्त की गयी है। परन्तु आज पूरे छः वर्ष बीत जाने के बाद भी जबकि देश भर में ट्रेन सेवाएं लगभग सामान्य हो चुकी हैं, यह छूट आज तक बहाल नहीं हुई है। ग़ौरतलब है कि उसी दौरान प्रधानमंत्री ने यह कहा था कि इतनी बड़ी आपदा, भारत के लिए एक संकेत लेकर आई है, एक संदेश लेकर आई है, एक अवसर लेकर आई है। भारत ने आपदा को, अवसर में बदल दिया है । रेल विभाग ने भी इसी आपदा में अवसर देखते हुये कोरोना काल की आड़ में कई ऐसे निर्णय ले डाले जो सरकार के लिये भले ही लाभदायक रहे हों परन्तु रेल यात्रियों के लिये तो हरगिज़ नहीं थे। मिसाल के तौर पर अनेक पैसेंजर ट्रेन को एक्सप्रेस ट्रेन बताकर कहीं स्टॉपेज कम कर दिये गये तो कहीं किराया बढ़ा दिया गया। कई ट्रेन स्थाई रूप से कैंसिल कर दी गयी तो कई ट्रेन के रुट बदल दिये गये। इनमें से कोरोना काल के समय किये गये कुछ परिवर्तन तो यथापूर्व किये गये परन्तु कुछ कोरोना काल समाप्त होने के बावजूद आज तक वैसे ही हैं। जैसे कि कोरोना काल में वरिष्ठ नागरिकों को रेल यात्रा में रेल टिकट पर मिलने वाली आंशिक छूट को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना।
सवाल यह है कि जब यह छूट समाप्त करते समय “अनावश्यक यात्रा रोकने” जैसा तर्क दिया गया था तो आज तक उस छूट को पुनः लागू क्यों नहीं किया गया ? जबकि अब न केवल कोरोना काल के पूर्व की लगभग सभी ट्रेन्स चल रही हैं बल्कि अनेक नई ट्रेन्स भी पटरियों पर दौड़ने लगी हैं? ग़ौरतलब है कि भारतीय रेल ने छात्र, दिव्यांगजन, रोगी, स्वतंत्रता सेनानी, युद्ध विधवाएँ जैसी कुल 53 श्रेणियों में विभिन्न स्तर पर छूट दी थी। इन्हीं में वरिष्ठ नागरिक भी शामिल थे। वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली टिकट छूट की सुविधा विभिन्न चरणों में 1985 में शुरू की गई थी। अगस्त 2001 से इसे स्वैच्छिक बना दिया गया अर्थात वरिष्ठ नागरिक चाहें तो छूट ले सकते थे। लेकिन यात्रा के दौरान छूट लेने वालों को अपनी आयु का कोई न कोई प्रमाण जैसे आधार, पैन कार्ड या पासपोर्ट आदि यात्रा के समय अपने साथ रखना अनिवार्य कर दिया गया था। इस सुविधा का लाभ देश के बुज़ुर्गों ने 35 वर्षों तक उठाया परन्तु स्वयं को लोकहितकारी बताने का ढिंढोरा पीटने वाली मोदी सरकार ने इसे कोरोना की आड़ में समाप्त कर दिया। जो सरकार छूट समाप्त करते समय “अनावश्यक यात्रा रोकने” जैसा तर्क दे रही थी वही सरकार अब इसे सरकार पर “वित्तीय बोझ” मान रही है। सरकार का तर्क है कि रेलवे पहले से ही भारी घाटे में चल रही है । रेल मंत्री संसद में बता भी चुके हैं कि रेलवे सभी यात्रियों को औसतन 45% सब्सिडी दे रही है । गोया प्रत्येक यात्री को पहले से ही काफ़ी राहत मिल रही है। कुछ आंकड़े बताते हैं कि सरकार अनावश्यक यात्रा रोकने जैसे उपाय कर देश के बुज़ुर्गों से अब तक दस हज़ार करोड़ से अधिक रूपये कमा चुकी है।
इसी सन्दर्भ में इस बात का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है कि बुज़ुर्गों की रेल यात्रा छूट समाप्त करने वाली यही सरकार जब चाहती है और जहाँ से चाहती है विभिन्न तीर्थ स्थलों की मुफ़्त यात्रा हेतु विशेष ट्रेन चला देती है। जब चाहती है चुनावी राज्यों के लिये स्थानीय प्रवासियों हेतु विशेष ट्रेन चलाकर उन्हें मतदान करने हेतु निःशुल्क भेजती है। गोया अपने वोट बैंक साधने के लिये तो सरकार तत्पर रहती है परन्तु इसी सरकार के पास न तो कोरोना काल की शुरुआत में इन्हीं प्रवासी मज़दूरों को उनके राज्यों व शहरों तक भेजने के लिये कोई ट्रेन थी न ही आज उन ट्रेन्स पर चलने वाले बुज़ुर्गों के लिये पूर्व में मिलने वाली छूट ? हालाँकि कभी कभार अपुष्ट सूत्रों से यह ख़बर सुनाई देती है कि शायद सरकार पुनः यह छूट देने पर विचार कर रही है। परन्तु इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। विपक्षी सांसदों ने इसे “बुजुर्गों के साथ अन्याय” बताते हुये लोकसभा में भी कई बार सवाल उठाए परन्तु सत्ता पक्ष ने “वित्तीय कारण” देकर यह सुविधा शुरू करने से इनकार कर दिया। बुजुर्ग संगठनों में भी इसे लेकर काफ़ी नाराज़गी व गहरी निराशा है। इसी लिये देश यह सवाल कर रहा है कि जब सांसदों विधायकों को आजीवन पेंशन देने के लिये “वित्तीय कारण” आड़े नहीं आते तो आख़िर सरकार बुज़ुर्गों को ट्रेन में छूट क्यों नहीं दे रही?” वरिष्ठ नागरिकों को आज भी इस बात की आस है कि आख़िर रेल यात्रा में मिलने वाली छूट कब शुरू होगी?

