नई दिल्ली, 04 अप्रैल (वेब वार्ता)। Donald Trump द्वारा ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के ऐलान ने भारतीय दवा उद्योग में चिंता बढ़ा दी है। इस फैसले का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है, जिनकी अमेरिकी बाजार में इनोवेटिव और स्पेशलिटी दवाओं में मजबूत मौजूदगी है।
हालांकि राहत की बात यह है कि जेनेरिक और बिना ब्रांड वाली दवाएं इस टैरिफ के दायरे में शामिल नहीं हैं, जिससे अधिकांश भारतीय निर्यातक कंपनियां इससे बच सकती हैं।
पेटेंटेड दवाएं क्यों होती हैं महंगी
पेटेंटेड दवाएं वे होती हैं, जिन पर किसी कंपनी का कानूनी अधिकार होता है। जब कोई कंपनी नई दवा के शोध और विकास में बड़ा निवेश करती है, तो उसे पेटेंट मिलता है, जो आमतौर पर 20 वर्षों तक वैध रहता है। इस अवधि में अन्य कंपनियां उस दवा का निर्माण या बिक्री नहीं कर सकतीं, जिससे कीमत तय करने का अधिकार एक ही कंपनी के पास रहता है।
सन फार्मा पर पड़ सकता है बड़ा असर
Sun Pharma के लिए यह टैरिफ बड़ा झटका साबित हो सकता है। कंपनी की कुल आय का 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है।
वित्तीय वर्ष 2025 में कंपनी के पेटेंटेड उत्पादों की वैश्विक बिक्री लगभग 1.2 अरब अमेरिकी डॉलर रही, जिसमें 85 से 90 प्रतिशत हिस्सेदारी अमेरिका की थी।
टैरिफ लागू होने से कंपनी की प्रमुख दवाएं जैसे Ilumya, Winlevi, Cequa और Sezaby महंगी हो सकती हैं, जिससे उनकी मांग पर असर पड़ने की आशंका है।
ग्लेनमार्क की प्रमुख दवा पर भी असर
Glenmark Pharmaceuticals की प्रमुख दवा Ryaltris पर भी इस टैरिफ का प्रभाव पड़ सकता है। यह एक ब्रांडेड दवा है और अमेरिकी बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही थी।
टैरिफ लागू होने के बाद इसकी कीमत दोगुनी होने की संभावना है, जिससे बिक्री में गिरावट आ सकती है।
शेयर बाजार में दिखा असर
ट्रंप के इस ऐलान के बाद दवा क्षेत्र के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी फार्मा सूचकांक में 3.5 से 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई, जबकि सन फार्मा और ग्लेनमार्क के शेयर 5 से 6 प्रतिशत तक टूट गए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टैरिफ नीति लागू होती है, तो भारतीय फार्मा कंपनियों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और आने वाले समय में इसके व्यापक आर्थिक असर देखने को मिल सकते हैं।



