नक्सलवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए लंबे समय से एक गंभीर चुनौती रहा है। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि गहरे सामाजिक-आर्थिक असंतुलन से जुड़ी समस्या भी है। पाठकों को बताता चलूं कि नक्सलवाद मूलतः माओवाद की विचारधारा से प्रभावित है, जिसकी प्रेरणा माओ त्से तुंग से मिलती है। यह विचारधारा सशस्त्र क्रांति के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त करने में विश्वास रखती है। इसी कारण इसे ‘वामपंथी उग्रवाद’ (लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म-एलडब्लयूई) भी कहा जाता है। वास्तव में, नक्सलवाद की शुरुआत वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी से हुई थी। यह एक उग्र वामपंथी आंदोलन है, जो मुख्यतः आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में सक्रिय रहा है। नक्सली संगठन सामाजिक असमानता, भूमि अधिकारों, गरीबी और शोषण के खिलाफ संघर्ष का दावा करते हैं, लेकिन अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंसक तरीकों का सहारा लेते हैं। इसके प्रमुख कारणों में गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा प्रशासनिक उपेक्षा शामिल रहे हैं।
यह समस्या विकास कार्यों में बाधा उत्पन्न करती रही है और साथ ही निर्दोष नागरिकों एवं सुरक्षा बलों के लिए गंभीर खतरा भी बनी है। हालांकि, हाल के वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 सोमवार को लोकसभा में यह बात कही है कि कि देश में वामपंथी उग्रवाद अपने अंतिम चरण में है और बस्तर, जो कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, अब लगभग पूरी तरह मुक्त हो चुका है। सरकार ने ‘जीरो टॉलरेंस'(शून्य सहनशीलता) नीति अपनाते हुए सुरक्षा बलों-जैसे कोबरा, सीआरपीएफ और डीआरजी को सक्रिय रूप से तैनात किया है। इसके साथ ही विकास को बढ़ावा देने के लिए 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण, 580 से अधिक फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों की स्थापना और हजारों मोबाइल टावर लगाए गए हैं। बस्तर क्षेत्र में अब गांवों में स्कूलों और राशन की दुकानों का विस्तार किया जा रहा है, जो सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है।
बहरहाल, यदि हम यहां पर ताज़ा आंकड़ों पर नजर डालें, तो वर्ष 2025 में देशभर में लगभग 137 नक्सली हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 52 नागरिकों और 33 सुरक्षा बलों के जवानों की मृत्यु हुई। इसके साथ ही सक्रिय नक्सलियों की संख्या घटकर लगभग 500-600 रह गई है। इतना ही नहीं नक्सलियों के आत्मसमर्पण के मामलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। मसलन, वर्ष 2024 में 881 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,337 हो गई। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में 383 नक्सली मारे गए, और वर्ष 2026 में 24 मार्च तक 633 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए हैं।और तो और भौगोलिक दृष्टि से भी बड़ा परिवर्तन हुआ है। वर्ष 2014 में जहां 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, वहीं 2025 तक यह संख्या घटकर लगभग 11 जिलों तक सीमित रह गई है। यह गिरावट दर्शाती है कि नक्सलवाद अब काफी हद तक नियंत्रित हो चुका है और लगातार कमजोर पड़ रहा है। हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर नक्सलवाद/लाल आतंक के प्रमुख कारणों की बात करें तो नक्सलवाद के प्रमुख कारणों में वनों का कुप्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, अव्यवस्थित जनजातीय नीतियां, क्षेत्रीय असमानताएं, भूमि सुधारों की कमी, औद्योगीकरण का अभाव और बेरोजगारी शामिल हैं।समाधान की दृष्टि से यह स्पष्ट है कि केवल सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए विकास, शिक्षा, रोजगार और संवाद का संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है। सरकार और समाज के संयुक्त प्रयासों से ही प्रभावित क्षेत्रों में न्याय, समानता और विश्वास का वातावरण बनाया जा सकता है। निष्कर्षतः, नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में प्रतीत होता है, किंतु इसके मूल सामाजिक-आर्थिक कारणों का समाधान करना अभी भी आवश्यक है। वास्तव में, हिंसा का मार्ग छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाना ही देश और समाज के हित में है।
(लेखक फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार है)


