नई दिल्ली, नेशनल डेस्क | वेब वार्ता
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन के दौरान सामने आए 56 लाख ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) वाले विवादित आवेदनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इन आवेदनों के शीघ्र निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की निगरानी में विशेष प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समयबद्ध और निष्पक्ष समाधान ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रख सकता है।
अदालत के आदेश के तहत अब राज्य सरकार, निर्वाचन आयोग और न्यायिक अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर इन लाखों आवेदनों को निर्धारित समय सीमा के भीतर निपटाने की तैयारी की जा रही है।
क्या है ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ विवाद?
मतदाता सूची संशोधन के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे आवेदन सामने आए, जिनमें नाम, पता, आयु, पहचान दस्तावेज या अन्य विवरणों में असंगतियां पाई गईं। इन्हें ही ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ श्रेणी में रखा गया है।
- एक ही व्यक्ति के कई पंजीकरण
- गलत या अधूरा पता
- आयु व पहचान में अंतर
- दस्तावेजों में तकनीकी त्रुटियां
- डुप्लीकेट एंट्री
इन विसंगतियों के कारण लगभग 56 लाख आवेदन विवादित श्रेणी में चले गए, जिससे मतदाता सूची के प्रकाशन में देरी और विवाद की स्थिति बन गई।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में अहम बैठक
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल की अध्यक्षता में आज एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जा रही है। इस बैठक में राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
बैठक का मुख्य उद्देश्य विवादित आवेदनों के निपटारे के लिए स्पष्ट कार्ययोजना और समयबद्ध रूपरेखा तैयार करना है।
बैठक में शामिल होंगे ये प्रमुख अधिकारी
इस उच्चस्तरीय बैठक में निम्न अधिकारी मौजूद रहेंगे:
- मुख्य निर्वाचन अधिकारी
- राज्य के मुख्य सचिव
- चुनाव आयोग के वरिष्ठ प्रतिनिधि
- पुलिस महानिदेशक (DGP)
- राज्य के एडवोकेट जनरल
- न्यायिक अधिकारी एवं प्रशासनिक प्रतिनिधि
इन सभी अधिकारियों की उपस्थिति से प्रक्रिया को पारदर्शी और प्रभावी बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
7 से 10 दिनों में निपटारे का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि इन 56 लाख विवादित आवेदनों का निपटारा 7 से 10 दिनों के भीतर किया जाए। अदालत ने कहा कि अनावश्यक देरी से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि समयसीमा का पालन न होने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
जिला जजों और पूर्व न्यायिक अधिकारियों की भूमिका
इन आवेदनों की जांच और निपटारे के लिए जिला न्यायाधीशों और पूर्व न्यायिक अधिकारियों की एक विशेष समिति गठित की गई है। यह समिति प्रत्येक मामले की निष्पक्ष समीक्षा करेगी।
अदालत के अनुसार, समिति द्वारा लिया गया निर्णय अंतिम और बाध्यकारी माना जाएगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समान महत्व प्राप्त होगा।
28 फरवरी तक अस्थायी सूची जारी होने की संभावना
कोर्ट ने संकेत दिया है कि 28 फरवरी 2026 तक विवादित आवेदनों को छोड़कर एक प्रारंभिक मतदाता सूची प्रकाशित की जा सकती है।
हालांकि, यह सूची अंतिम नहीं होगी और आपत्तियों के निपटारे के बाद इसमें संशोधन किया जाएगा।
प्रशासनिक सहयोग और सुरक्षा व्यवस्था
मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। वे समिति को प्रशासनिक सहायता और सुरक्षा प्रदान करेंगे।
इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि प्रक्रिया बिना किसी दबाव या हस्तक्षेप के पूरी हो सके।
लोकतंत्र पर इस फैसले का प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाएगा। इससे मतदाता सूची से जुड़े विवादों में कमी आएगी और आम जनता का भरोसा मजबूत होगा।
न्यायिक निगरानी के कारण राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की गुंजाइश भी कम होगी।
निष्कर्ष
56 लाख विवादित आवेदनों के निपटारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
यदि तय समय सीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो इससे पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों की विश्वसनीयता और मजबूती बढ़ेगी।
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