लखनऊ, अजय कुमार | वेब वार्ता
राज्य संग्रहालय, लखनऊ एवं संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा कला अभिरुचि पाठ्यक्रम व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत 20 फरवरी 2026 को ‘गुप्त कालीन कला में सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश-विदेश के विद्वानों एवं शोधार्थियों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य वक्ता प्रो. शैलेन्द्र नाथ कपूर, पूर्व विभागाध्यक्ष, पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के स्वागत के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रो. विद्या दहेजिया, पद्मविभूषण से सम्मानित कला इतिहासकार एवं कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क की प्रोफेसर भी उपस्थित रहीं।
गुप्तकालीन कला को बताया स्वर्ण युग की पहचान
मुख्य वक्ता प्रो. एस.एन. कपूर ने अपने व्याख्यान में कहा कि चौथी से छठी शताब्दी का काल भारतीय कला का स्वर्ण युग माना जाता है, जिसे गुप्तकाल के नाम से जाना जाता है। इस काल में कला, संस्कृति और स्थापत्य का अभूतपूर्व विकास हुआ।
उन्होंने बताया कि संस्कृति से निर्मलता का निर्माण होता है और ज्ञान की प्राप्ति तीन प्रकार से होती है — आभ्यासिक, औपदेशिक एवं सारस्वत।
गुप्त संवत और शासकों पर प्रकाश
प्रो. कपूर ने अल्बरूनी द्वारा लिखित ग्रंथों का उल्लेख करते हुए बताया कि शक संवत के 241 वर्ष बाद गुप्त संवत की शुरुआत हुई। उन्होंने प्रमुख गुप्त शासकों — चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त के योगदान पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
गुप्तकालीन मंदिर और स्थापत्य की विशेषताएं
व्याख्यान में गुप्तकालीन मंदिरों, मूर्तियों, सिक्कों और आभूषणों की विशेषताओं पर चर्चा की गई। उन्होंने बताया कि उस काल के मंदिरों में मुख्यतः चार भाग होते थे —
- गर्भगृह
- मंडप
- प्रदक्षिणा पथ
- बरामदा
इसके साथ ही उन्होंने अभिलेखों और ऐतिहासिक स्रोतों के माध्यम से गुप्तकालीन कला की प्रमाणिकता पर भी प्रकाश डाला।
प्रतिभागियों को मिला विद्वानों का मार्गदर्शन
प्रो. विद्या दहेजिया ने कला अभिरुचि कार्यक्रम की सराहना करते हुए प्रतिभागियों को भारतीय कला परंपरा से जुड़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं में सांस्कृतिक चेतना विकसित करने में सहायक होते हैं।
धन्यवाद ज्ञापन और उपस्थिति
कार्यक्रम के समापन पर डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक द्वारा मुख्य वक्ता का धन्यवाद ज्ञापन किया गया।
इस अवसर पर श्री शारदा प्रसाद, सुश्री प्रीती साहनी, डॉ. अनीता चौरसिया, श्री धनंजय कुमार राय, श्रीमती शशिकला राय, श्रीमती शालिनी श्रीवास्तव, श्री प्रमोद कुमार, श्री राहुल सैनी, श्रीमती गायत्री गुप्ता सहित संग्रहालय के समस्त कर्मचारी उपस्थित रहे।
निष्कर्ष
राज्य संग्रहालय द्वारा आयोजित यह व्याख्यान भारतीय सांस्कृतिक विरासत और गुप्तकालीन कला को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। इससे विद्यार्थियों और शोधार्थियों को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समृद्ध होने का अवसर मिला।
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