ढाका/नई दिल्ली, नेशनल डेस्क | वेब वार्ता
बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में दिए गए विदाई भाषण में भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र ‘सात बहनों’ और चीन का जिक्र कर क्षेत्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। यह भाषण ऐसे समय आया है, जब उनकी सरकार घरेलू असंतोष, अल्पसंख्यक सुरक्षा में नाकामी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में देरी को लेकर भारी दबाव में है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह भाषण घरेलू विफलताओं से ध्यान हटाने और विदेश नीति में “स्वतंत्रता” का संदेश देने की कोशिश था।
विदाई भाषण में राष्ट्रवादी तेवर
अपने भाषण में यूनुस ने बार-बार संप्रभुता, आत्मसम्मान और स्वतंत्र विदेश नीति की बात दोहराई। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने बांग्लादेश को किसी भी बाहरी दबाव से मुक्त करने का प्रयास किया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि अब बांग्लादेश किसी देश के निर्देश पर नहीं चलता, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले करता है।
‘सात बहनों’ का उल्लेख और भारत की चिंता
यूनुस ने नेपाल, भूटान और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों—असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा—को एक ही आर्थिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र मिलकर एक बड़ा आर्थिक केंद्र बन सकता है, जहां बांग्लादेश “द्वार” की भूमिका निभाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान भारत के लिए संवेदनशील है, क्योंकि पूर्वोत्तर भारत देश का अभिन्न हिस्सा है और वहां की कनेक्टिविटी भारत की रणनीतिक प्राथमिकता रही है।
कनेक्टिविटी परियोजनाओं की पृष्ठभूमि
पिछले एक दशक में भारत ने बांग्लादेश के माध्यम से पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने के लिए सड़क, रेल और जलमार्ग परियोजनाओं में भारी निवेश किया है।
यूनुस का बयान इस प्रयास को एक अलग क्षेत्रीय ढांचे में प्रस्तुत करने की कोशिश माना जा रहा है।
चीन कार्ड और तीस्ता परियोजना
अपने भाषण में यूनुस ने चीन के साथ सहयोग को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने तीस्ता नदी परियोजना और एक अंतरराष्ट्रीय अस्पताल परियोजना में हुई प्रगति का उल्लेख किया।
तीस्ता परियोजना भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र के निकट स्थित है, जिससे सुरक्षा चिंताएं जुड़ी हुई हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, इस परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका भारत के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है।
सैन्य आधुनिकीकरण का संकेत
यूनुस ने अपने भाषण में सेना के आधुनिकीकरण की भी चर्चा की और कहा कि सशस्त्र बलों को किसी भी चुनौती से निपटने के लिए मजबूत किया जा रहा है।
हालांकि, उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन इस बयान को क्षेत्रीय संदर्भ में देखा जा रहा है।
घरेलू असफलताओं पर चुप्पी
यूनुस के भाषण की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने अपने कार्यकाल की प्रमुख विफलताओं पर कोई चर्चा नहीं की।
सांप्रदायिक हिंसा, अल्पसंख्यक समुदाय पर हमले, मंदिरों की तोड़फोड़ और कट्टरपंथी गतिविधियों पर उन्होंने मौन साधे रखा।
मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक समूहों का आरोप है कि सरकार ने इन मुद्दों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
लोकतंत्र बहाली पर सवाल
यूनुस सरकार का मुख्य वादा लोकतंत्र की बहाली और निष्पक्ष चुनाव कराना था, लेकिन इस दिशा में ठोस प्रगति नहीं हो सकी।
विपक्षी दलों का कहना है कि अंतरिम सरकार ने सत्ता में बने रहने को प्राथमिकता दी।
भारत विरोधी और पाकिस्तान झुकाव की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यूनुस का भाषण भारत के प्रति असंतुलित दृष्टिकोण और पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता का संकेत देता है।
हालांकि उन्होंने “संतुलित नीति” की बात कही, लेकिन भारत की संवेदनशीलताओं को महत्व नहीं दिया।
राजनीतिक विरासत पर प्रश्नचिह्न
यूनुस ने अपने कार्यकाल को सुधारों की कहानी बताया, लेकिन आलोचकों के अनुसार उनकी विरासत विवादों और अधूरे वादों से भरी रही।
लोकतंत्र, सामाजिक समरसता और आंतरिक स्थिरता अभी भी कमजोर बनी हुई है।
नई सरकार के लिए चुनौती
आने वाली चुनी हुई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत के साथ रिश्तों को फिर से संतुलित करना और घरेलू स्थिरता बहाल करना होगी।
साथ ही, चीन और पाकिस्तान के साथ संबंधों में पारदर्शिता भी आवश्यक होगी।
निष्कर्ष
मुहम्मद यूनुस का विदाई भाषण घरेलू दबाव से ध्यान हटाने और खुद को मजबूत नेता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास प्रतीत होता है।
यह भाषण क्षेत्रीय भू-राजनीति में नए समीकरणों की ओर इशारा करता है, जिसमें भारत के लिए सतर्कता और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा।
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