Wednesday, February 18, 2026
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देवगढ़ की आत्मा का वनवास!

-कब लौटेंगे अपने धाम भगवान नृवराह?

-निर्वासित जीवन जीने को अभिशप्त हैं भगवान!

-कोर्ट ने तस्करों को सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा

-राजीव श्रीवास्तव-

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में बेतवा नदी के तट पर स्थित देवगढ़, जिसे ‘बेत्त्रवती की गोद’ कहा जाता है, केवल पत्थरों का शहर नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। यहाँ के मंदिरों में भगवान विष्णु का ‘नृवराह’ (वराह) स्वरूप क्षेत्र की समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था। किंतु तीन दशक पहले हुई एक क्रूरतम घटना ने देवगढ़ की इस ‘आत्मा’ को टुकड़ों में बाँटकर उसके मूल स्थान से जुदा कर दिया। बाद में जन आंदोलन के भारी दबाव में मूर्ति को टुकड़ों के रूप बरामद कर लिया गया । इस अपराध को न्यायालय ने भी संस्कृति पर डकैती मानते हुए आरोपियों को आजन्म कारावास की सज़ा से दंडित कर नज़ीर पेश की, लेकिन तब से लेकर आज तक पुरातात्व एवं मूर्ति कला ये बेजोड़ मूर्ति पुरातत्व विभाग के मालखाने में धूल फाँक रही है ।

वह काली रात:
चोरी की यह वारदात २६/ २७ सितंबर 1990 की दरमियानी रात थी। अंतरराष्ट्रीय तस्करों के एक गिरोह ने देवगढ़ के घने व शांत जंगलों प्राचीन नृ वराह मंदिर को निशाना बनाया। तस्करों ने इस विशालकाय और भारी मूर्ति को आधार से काटने और उखाड़ने के लिए तीन दिनों तक जंगल में डेरा डाला था। मूर्ति इतनी भारी थी कि उसे बिना क्रेन और चरखी के हिलाना असंभव था। इस लिए उसे तीन भागों में काट दिया गया । तस्करों ने एक ट्रक का उपयोग किया और बीहड़ रास्तों से इसे जिले की सीमा पार ले जाने की योजना बनाई।

आक्रोश व आमरण अनशन-
जब सुबह लोग देवगढ़ के पहाड़ पर स्थित नृ वराह मंदिर पहुँचे तो गर्भगृह सूना मिला, मूर्ति अपने स्थान से ग़ायब थी। इस घटना की खबर जंगल में आग की तरह फैली और पूरे ललितपुर में कोहराम मच गया। पुरातत्व विभाग की लापरवाही के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई।

आमरण अनशन: ललितपुर के ऐतिहासिक घंटाघर प्रांगण में वरिष्ठ पत्रकार संतोष शर्मा व राजीव श्रीवास्तव (लेखक स्वयं) के नेतृत्व में स्थानीय नागरिकों, और समाजसेवियों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। विरोध में बाज़ार बंद हो गए ।

प्रशासनिक हलचल:

भारी जन आंदोलन के दबाव में तत्कालीन एसपी वी.के. बाजपेयी के नेतृत्व में पुलिस ने चौतरफा घेराबंदी की ।जनदबाव इतना था कि लखनऊ तक की सरकार हिल गई थी।

बरामदगी और गिरफ्तारियां-
पुलिस की मुस्तैदी और स्थानीय मुखबिरों (चरवाहों) की सूचना पर अक्टूबर 1990 के प्रथम सप्ताह में मूर्ति को बरामद कर लिया गया। इस कांड में अमर सिंह, राजाराम और उनके स्थानीय मददगारों को धर दबोचा गया।

तस्करों का नेटवर्क:
जांच में अलीगढ़ के कुख्यात अंतरराष्ट्रीय मूर्ति तस्कर शैतान सिंह का नाम मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने आया। हालांकि वह चालाकी से पुलिस की पकड़ से बचता रहा, लेकिन उसके पूरे सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ जो मूर्तियों को नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेचता था। उस समय इस 1400 वर्ष पुरानी मूर्ति की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पाँच करोड़ रुपये बताई गई थी ।

न्याय का ऐतिहासिक अध्याय, न्यायाधीश विष्णु दत्त द्विवेदी का फैसला-
इस मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश विष्णु दत्त द्विवेदी की अदालत में हुई। उन्होंने एक ऐसा फैसला सुनाया जो नजीर बन गया। न्यायाधीश ने मूर्ति चोरी को केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक डकैती” माना और अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह भारत में संभवतः पहला ऐसा मामला था जहाँ मूर्ति चोरी के लिए इतनी कठोरतम सजा दी गई, जिसने तस्करों के गिरोह की कमर तोड़ दी।

एएसआई (ASI) की बेरुखी और धूल फांकती विरासत-
विडंबना देखिए कि जिस मूर्ति को बचाने के लिए जनता ने आमरण अनशन किया और न्यायपालिका ने कठोतम रुख अपनाया, वह आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की फाइलों और संग्रहालयों की धूल फांक रही है।देवगढ़ संग्रहालय या सुरक्षित कक्षों में रखी यह प्रतिमा उचित रखरखाव और प्रदर्शन के अभाव में अपनी चमक खो रही है।
सूना मंदिर-
देवगढ़ का वह मूल मंदिर जहाँ भगवान नृवराह विराजते थे, आज केवल एक ऊँचा चबूतरा और वीरान खंडहर बनकर रह गया है। एएसआई ने सुरक्षा के नाम पर मूर्ति को उसके भक्तों और उसके मूल स्थान से दूर कर दिया है।
यक्ष प्रश्न ये है कि कब लौटेंगे भगवान नृवराह?
आज देवगढ़ का हर पत्थर यह सवाल पूछता है कि क्या सुरक्षा के नाम पर किसी भगवान को उनके ही धाम से निर्वासित रखना उचित है?
ललितपुर की जनता चाहती है कि आधुनिक सुरक्षा तकनीकों (सीसीटीवी, बुलेटप्रूफ ग्लास और सशस्त्र गार्ड) के साथ भगवान नृवराह को पुनः उनके मूल स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाए।
जब तक भगवान नृवराह अपने मंदिर में पुनः स्थापित नहीं होते, तब तक देवगढ़ की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना अधूरी है। यह केवल एक मूर्ति की वापसी नहीं, बल्कि ललितपुर के गौरव और विश्वास की वापसी होगी।

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