Monday, February 16, 2026
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हाथ से लिखना: तेज़ रफ्तार जीवन में मन का ठहराव और आत्मसंवाद की वापसी

-डॉ. प्रियंका सौरभ- ywAAAAAAQABAAACAUwAOw==

आज का समय गति का है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन चमकने लगती है, सूचनाओं की बाढ़ हमारे भीतर उतरने लगती है और दिन कब शुरू होकर कब थकान में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। ई-मेल, व्हाट्सऐप, नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया-सब मिलकर हमारे ध्यान, हमारी भावनाओं और हमारे समय पर लगातार दावा करते रहते हैं। इस डिजिटल युग में संवाद तो बढ़ा है, लेकिन आत्मसंवाद कहीं पीछे छूट गया है। ऐसे में हाथ से लिखने जैसी सरल, शांत और आत्मीय प्रक्रिया का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ जाता है।

हाथ से लिखना सिर्फ़ शब्दों को काग़ज़ पर उतारना नहीं है, यह मन को गति से बाहर निकालकर ठहराव की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। जब हम कलम उठाते हैं, तो शरीर और मस्तिष्क एक लय में आते हैं। उँगलियों की गति, स्याही की धार और काग़ज़ का स्पर्श-ये सब मिलकर हमारे भीतर चल रहे शोर को धीरे-धीरे शांत करने लगते हैं। यही कारण है कि दिन के अंत में, सोने से पहले यदि कोई व्यक्ति अपनी दिनचर्या की पाँच पंक्तियाँ भी लिख लेता है, तो उसे एक अनकहा सुकून मिलता है-ऐसा सुकून जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन होता है।

आज की जीवनशैली में तनाव, चिंता और अनिद्रा आम समस्याएँ बन चुकी हैं। हम दिन भर दूसरों के लिए सोचते हैं-काम के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए-लेकिन अपने मन से बातचीत का समय शायद ही निकाल पाते हैं। लिखना इस कमी को पूरा करता है। जब हम अपने अनुभव, भावनाएँ और विचार काग़ज़ पर उतारते हैं, तो हम उन्हें स्वीकार करते हैं। यह स्वीकार्यता ही मानसिक शांति की पहली सीढ़ी है। मन के भीतर जो बातें उलझन बनकर घूमती रहती हैं, वे लिखते ही स्पष्ट होने लगती हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि हाथ से लिखना मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करता है, जो भावनात्मक संतुलन और स्मृति से जुड़े होते हैं। डिजिटल टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखे शब्दों का प्रभाव अधिक गहरा होता है, क्योंकि इसमें सोच और लिखने के बीच सीधा संबंध बनता है। यही कारण है कि जब हम अपनी परेशानियाँ, डर या थकान लिखते हैं, तो उनका बोझ हल्का महसूस होने लगता है। यह प्रक्रिया एक तरह की आत्मचिकित्सा बन जाती है-बिना किसी दवा, बिना किसी खर्च के।

रात के समय लिखने की आदत विशेष रूप से प्रभावी मानी जाती है। दिन भर की घटनाएँ, भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ मन में जमा रहती हैं। यदि हम उन्हें वहीं छोड़कर सो जाते हैं, तो वे नींद में भी हमारा पीछा करती हैं। लेकिन जब हम सोने से पहले उन्हें लिख देते हैं, तो मन को संकेत मिलता है कि अब दिन पूरा हो चुका है। यह संकेत नींद की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाता है। पाँच पंक्तियाँ ही सही-आज क्या अच्छा हुआ, क्या कठिन लगा, किस बात ने मुस्कुराया, किस बात ने सिखाया-इतना लिखना भी पर्याप्त है।

हाथ से लिखना हमें ईमानदार बनाता है। यहाँ न कोई लाइक है, न कोई टिप्पणी, न कोई बाहरी मूल्यांकन। यह एक निजी स्थान है, जहाँ हम बिना डर के अपने सच को रख सकते हैं। कई बार हम समाज के डर से या दूसरों की अपेक्षाओं के कारण अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। लिखना उन्हें सुरक्षित रास्ता देता है। काग़ज़ हमारा गवाह बनता है-न्याय नहीं करता, बस सुनता है।

आज बच्चों और युवाओं के जीवन में भी यह आदत अत्यंत आवश्यक हो गई है। डिजिटल शिक्षा और स्क्रीन-आधारित मनोरंजन ने उनकी लेखन क्षमता और एकाग्रता को प्रभावित किया है। हाथ से लिखने की आदत न केवल भाषा और अभिव्यक्ति को सशक्त बनाती है, बल्कि धैर्य और अनुशासन भी सिखाती है। जब बच्चा या युवा अपने मन की बात लिखना सीखता है, तो वह भावनात्मक रूप से अधिक संतुलित बनता है। यह मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में एक सशक्त कदम है।

इतिहास गवाह है कि लेखन हमेशा से आत्ममंथन का साधन रहा है। डायरी लिखना, पत्र लिखना या विचारों को नोट करना-ये सब परंपराएँ केवल साहित्यिक नहीं थीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी थीं। आज जब हम इन परंपराओं से दूर हो रहे हैं, तब अवसाद और अकेलापन बढ़ रहा है। यह संयोग नहीं, बल्कि संकेत है कि हमें फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटने की ज़रूरत है।

यह कहना भी आवश्यक है कि हाथ से लिखना तकनीक का विरोध नहीं है। तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन संतुलन बनाए रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। जैसे शरीर के लिए व्यायाम आवश्यक है, वैसे ही मन के लिए लिखना आवश्यक हो सकता है। दिन में भले ही हम डिजिटल माध्यमों पर निर्भर रहें, लेकिन रात को अपने लिए कुछ पल निकालना-काग़ज़ और कलम के साथ-एक स्वस्थ आदत है।

कई लोग यह सोचकर लिखना शुरू नहीं करते कि उन्हें “अच्छा लिखना” नहीं आता। लेकिन लिखने का उद्देश्य साहित्य रचना नहीं, बल्कि मन की सफ़ाई है। यहाँ व्याकरण, शैली या सुंदर शब्दों की आवश्यकता नहीं। जो जैसा महसूस हो, वैसा लिख देना ही पर्याप्त है। कभी-कभी टूटी-फूटी पंक्तियाँ भी मन की सबसे सच्ची आवाज़ होती हैं।

समाज के स्तर पर भी यदि लिखने की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। स्कूलों, कार्यस्थलों और परिवारों में यदि आत्मलेखन को प्रोत्साहित किया जाए, तो लोग अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ और व्यक्त कर पाएँगे। इससे संवाद सुधरेगा, तनाव घटेगा और रिश्तों में गहराई आएगी।

अंततः, हाथ से लिखना हमें इंसान बनाए रखता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम सिर्फ़ उपभोक्ता या उत्पादक नहीं, बल्कि महसूस करने वाले जीव हैं। दिन के अंत में जब हम अपनी पाँच पंक्तियाँ लिखते हैं, तो हम खुद से कहते हैं-“मैंने आज के दिन को देखा, जिया और स्वीकार किया।” यही स्वीकार्यता सुकून बनकर दिल में उतरती है।

तेज़ रफ्तार समय में ठहरना एक साहस है, और हाथ से लिखना उस साहस का सरल अभ्यास। कलम उठाइए, काग़ज़ खोलिए और खुद से मिलने का यह छोटा सा समय रोज़ दीजिए। हो सकता है दुनिया न बदले, लेकिन आपका मन ज़रूर बदल जाएगा-और यही सबसे बड़ा परिवर्तन है।

(लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक)


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