हरदोई, लक्ष्मीकान्त पाठक | वेब वार्ता
जनपद के पावन तीर्थस्थल योगेश्वर धाम, अटवा असिगाव में प्रवाहित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर भक्ति, करुणा और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास शिवानी मिश्रा के ओजस्वी एवं भावपूर्ण श्रीमुख से सुदामा चरित्र और कंस वध की दिव्य कथा का ऐसा सजीव चित्रण हुआ कि उपस्थित श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर हो उठे।
सुदामा चरित्र: मित्रता और निष्कलुष भक्ति का प्रतीक
कथा व्यास ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि यह प्रसंग केवल दो मित्रों की भेंट भर नहीं, बल्कि आत्मीयता, समर्पण और निष्कपट भक्ति का कालजयी प्रतीक है। जब निर्धनता से व्यथित सुदामा अपने सखा भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ द्वारिका पहुंचे, तब भगवान ने राजसी वैभव त्याग कर जिस प्रेम और विनय से उनका स्वागत किया, वह भक्त और भगवान के मध्य अटूट संबंध का अनुपम उदाहरण है।
कथा के दौरान बताया गया कि सुदामा की झोली में भले ही चावल के कुछ दाने थे, किंतु उनके हृदय में असीम श्रद्धा और प्रेम का अथाह सागर था। यही भाव भगवान को प्रिय हुआ और बिना मांगे ही सुदामा को अपार कृपा प्राप्त हुई।
- सुदामा चरित्र – सच्ची मित्रता और समर्पण का संदेश
- ईश्वर के द्वार पर धन नहीं, श्रद्धा और प्रेम का मूल्य
- भक्त की मौन पुकार भी भगवान तक पहुंचती है
कंस वध: अधर्म पर धर्म की विजय
इसके उपरांत कथा व्यास ने कंस वध का ओजस्वी चित्रण करते हुए बताया कि कंस अहंकार, अत्याचार और अधर्म का प्रतीक था। उसके अत्याचारों से संपूर्ण पृथ्वी पीड़ित थी। जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंचा, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसका संहार कर सत्य और न्याय की पुनर्स्थापना की।
यह प्रसंग इस सनातन सत्य को रेखांकित करता है कि अधर्म चाहे जितना प्रबल हो, अंततः विजय धर्म की ही होती है। कथा के दौरान वातावरण “राधे-कृष्ण” और “हरे कृष्ण” के उद्घोषों से गुंजायमान हो उठा।
श्रद्धालुओं की भावनात्मक सहभागिता
कथा स्थल पर उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति के अश्रु और हृदय में दिव्य शांति स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। सम्पूर्ण परिसर भक्ति की अविरल धारा में निमग्न दिखाई दिया। आरती के समय श्रद्धालुओं ने प्रभु चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित कर धर्म, भक्ति और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
- “राधे-कृष्ण” और “हरे कृष्ण” के जयघोष से गुंजायमान परिसर
- सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति
- भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का वातावरण
निष्कर्ष
योगेश्वर धाम में आयोजित यह कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम भी बनी। सुदामा चरित्र ने मित्रता और समर्पण का संदेश दिया, जबकि कंस वध ने धर्म की अंतिम विजय का विश्वास मजबूत किया। इस प्रकार कथा ने जनमानस में भक्ति, प्रेम और नैतिकता के मूल्यों को पुनर्जीवित करने का कार्य किया।
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