नई दिल्ली, डेस्क | वेब वार्ता
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने 13 फरवरी को विश्वस्तरीय चेहरा प्रत्यारोपण कार्यक्रम की दिशा में निर्णायक तैयारी प्रारंभ कर दी है। यह पहल क्या है, कब शुरू होगी, क्यों महत्वपूर्ण है और इससे किसे लाभ मिलेगा—इन सभी प्रश्नों के बीच यह स्पष्ट है कि भारत दक्षिण एशिया में पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ने की ओर अग्रसर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जटिल चिकित्सा कार्यक्रम देश को वैश्विक चिकित्सा नवाचार की अग्रिम पंक्ति में स्थापित कर सकता है।
क्या है चेहरा प्रत्यारोपण और इसकी उपयोगिता
चेहरा प्रत्यारोपण एक उन्नत संयुक्त ऊतक प्रत्यारोपण प्रक्रिया है, जिसमें दाता के चेहरे के आंशिक या पूर्ण ऊतकों को गंभीर रूप से विकृत या क्षतिग्रस्त रोगी में प्रत्यारोपित किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल सौंदर्य सुधार नहीं, बल्कि चेहरे की संरचना, कार्यक्षमता और भाव-प्रदर्शन की पुनर्स्थापना करना होता है।
इस प्रक्रिया से रोगी की बोलने, खाने और सांस लेने की क्षमता में सुधार संभव होता है। आंखों की सुरक्षा, चेहरे की संवेदनशीलता और मानसिक आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अम्ल हमले, गंभीर जलन या दुर्घटनाओं में चेहरा गंवा चुके मरीजों के लिए यह तकनीक जीवन बदलने वाली साबित हो सकती है।
संस्थान की आधारभूत संरचना और अनुभव
| विभाग | स्थापना वर्ष | जटिल सूक्ष्म सर्जरी (वार्षिक) | कुल शल्य क्रियाएं (वार्षिक) |
|---|---|---|---|
| बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग | 2021 | 250+ | 8000+ |
एम्स के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग की स्थापना वर्ष 2021 में की गई थी। यहां प्रतिवर्ष 250 से अधिक जटिल सूक्ष्म पुनर्निर्माण शल्य प्रक्रियाएं तथा 8000 से अधिक कुल शल्य क्रियाएं संपन्न होती हैं। अम्ल हमले और गंभीर रूप से झुलसे रोगियों के उपचार एवं पुनर्वास का व्यापक अनुभव चेहरा प्रत्यारोपण जैसी बहुस्तरीय प्रक्रिया के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है।
150 से अधिक विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम
| विशेषज्ञता | भूमिका |
|---|---|
| प्लास्टिक एवं पुनर्निर्माण सर्जन | मुख्य प्रत्यारोपण प्रक्रिया |
| कर्ण-नाक-गला व मुख-जबड़ा विशेषज्ञ | संरचनात्मक समन्वय |
| बेहोशी एवं अतिदक्षता दल | दीर्घकालिक ऑपरेशन प्रबंधन |
| प्रतिरक्षा एवं प्रत्यारोपण विशेषज्ञ | अस्वीकृति नियंत्रण व दवा प्रबंधन |
चेहरा प्रत्यारोपण के लिए 150 से अधिक विशेषज्ञों की बहु-विषयक टीम गठित की जा रही है। 14 से 16 घंटे तक चलने वाली इस जटिल शल्य प्रक्रिया में नसों और रक्त वाहिकाओं का सूक्ष्म संयोजन सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। साथ ही रोगी को जीवनभर प्रतिरक्षा दमन औषधियां लेनी पड़ती हैं, जिससे संक्रमण और प्रत्यारोपण अस्वीकृति का जोखिम बना रहता है।
- दीर्घकालिक 14–16 घंटे की सर्जरी
- सूक्ष्म नसों एवं रक्त वाहिकाओं का संयोजन
- जीवनभर प्रतिरक्षा दमन चिकित्सा की आवश्यकता
वैश्विक सहयोग, प्रशिक्षण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
संस्थान ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ शैक्षणिक सहयोग को सुदृढ़ किया है। इंद्रनील सिन्हा के मार्गदर्शन में शवाधारित कार्यशालाएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं, जिससे भारतीय शल्य चिकित्सकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप तकनीकी दक्षता प्राप्त हो रही है।
चेहरे के पुनर्निर्माण की अवधारणा आधुनिक चिकित्सा में प्रथम विश्व युद्ध काल से जुड़ी मानी जाती है। वहीं भारत में प्राचीन काल में महर्षि सुश्रुत द्वारा वर्णित नासिका पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा चिकित्सा इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वर्तमान पहल उसी गौरवशाली परंपरा का आधुनिक विस्तार है।
आगे की रणनीति और महत्व
संस्थान ने नैतिक एवं प्रत्यारोपण समिति ढांचे, अनुसंधान विस्तार, नियामकीय स्वीकृतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को लेकर व्यापक तैयारी प्रारंभ कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्यक्रम भारत को एशिया में चेहरा प्रत्यारोपण के अग्रणी केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है।
यदि आप स्वास्थ्य और उन्नत चिकित्सा तकनीकों से जुड़ी विश्वसनीय खबरें पढ़ना चाहते हैं, तो अभी हमारे साथ जुड़ें।
निष्कर्ष
एम्स की यह पहल केवल एक चिकित्सीय उपलब्धि नहीं, बल्कि उन रोगियों के लिए नई पहचान और आत्मविश्वास का माध्यम बन सकती है जिनके लिए पारंपरिक उपचार सीमित हो चुके हैं। यदि यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू होता है, तो भारतीय चिकित्सा विज्ञान को वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाई मिलेगी और दक्षिण एशिया में उन्नत प्रत्यारोपण सेवाओं का केंद्र स्थापित होगा।
👉 स्वास्थ्य और मेडिकल अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सएप्प चैनल को फॉलो करें – Web Varta
ये भी पढ़ें: Delhi Crime History Sheeter Satbbed: कल्याणपुरी में घोषित बदमाश की चाकू गोदकर हत्या, शौचालय के पास मिला शव







