भिंड / ग्वालियर, मुकेश शर्मा | वेब वार्ता
भिंड जिले के अटेर क्षेत्र स्थित ग्राम चौकी में संतोषी माता मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कथा व्यास श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर रामभूषण दास जी महाराज ने गोवर्धन लीला का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र के अहंकार को चूर करने के लिए अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण कर लीला रची थी।
इंद्र के अभिमान को तोड़ने की दिव्य लीला
कथा व्यास ने कहा कि एक समय देवराज इंद्र को अपने पद और शक्ति का अत्यधिक अभिमान हो गया था। बृजवासी इंद्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने माता यशोदा से प्रश्न कर इंद्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा का संदेश दिया, क्योंकि वही गायों और बृजवासियों का पालनकर्ता था।
मूसलाधार वर्षा और गोवर्धन धारण
इंद्र ने इसे अपना अपमान समझकर सात दिनों तक मूसलाधार वर्षा कर दी। प्रलय समान स्थिति उत्पन्न होने पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को गाय-बछड़ों सहित शरण दी।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| लीला का नाम | गोवर्धन लीला |
| उद्देश्य | इंद्र का अभिमान तोड़ना |
| अवधि | सात दिन तक वर्षा |
| संदेश | अहंकार का त्याग और भक्ति |
इंद्र को हुआ अपनी भूल का एहसास
लगातार असफल होने पर देवराज इंद्र ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी से यह जानकर कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं, इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान से क्षमा मांगी और विधिवत पूजा-अर्चना कर उनका सम्मान किया।
- इंद्र ने अहंकार त्यागकर क्षमा याचना की
- भगवान श्रीकृष्ण की महिमा स्वीकार की
- भक्ति और विनम्रता का संदेश
- गोवर्धन पूजा की परंपरा की शुरुआत
गोवर्धन पूजा की परंपरा पर प्रकाश
कथा व्यास ने बताया कि इसी लीला के बाद से गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई। इस दिन गाय-बैलों को स्नान कराकर सजाया जाता है, उन्हें गुड़-चावल खिलाया जाता है और गोवर्धन पर्वत की विधिवत पूजा की जाती है।
संत-महात्माओं की गरिमामयी उपस्थिति
कथा के दौरान श्री रामदास जी महाराज दंदरौआ धाम, श्री कमलदास महाराज टीकरी धाम, श्री अवधूत महाराज चिलोंगा सरकार, संत समिति के जिलाध्यक्ष कालिदास महाराज, त्यागी जी महाराज सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे।
निष्कर्ष
श्रीमद्भागवत कथा में गोवर्धन लीला का यह प्रसंग श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, विनम्रता और धर्म का संदेश लेकर आया। कथा व्यास के प्रेरणादायक प्रवचनों से श्रोता भावविभोर हो उठे और भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गुणगान किया।
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