Wednesday, February 11, 2026
व्हाट्सएप पर हमसे जुड़ें

गंडक पुल की मांग पर सियासी चुप्पी, नीति और नियत पर उठे गंभीर सवाल

कुशीनगर, ममता तिवारी | वेब वार्ता

उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाली जटहाँ–बगहा (गंडक) पुल परियोजना अब केवल एक विकास कार्य नहीं रह गई है, बल्कि यह नीति, नियत और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। वर्ष 2023 में वैकल्पिक मार्ग की समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी इस परियोजना पर ठोस कार्रवाई न होना सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

2023 के नोटिस के बाद भी नहीं हुआ समाधान

वर्ष 2023 में वीटीआर विभाग द्वारा एनएचएआई को स्पष्ट रूप से सूचित किया गया था कि निर्धारित शर्तों की अवधि समाप्त हो चुकी है और वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता है। इसके बावजूद परियोजना को लेकर न तो समयबद्ध कार्य हुआ और न ही ठोस निर्णय लिया गया। इसके बाद से जटहाँ और बगहा क्षेत्र में पुल निर्माण की मांग लगातार तेज होती गई।

लंबे मार्ग से भ्रम की स्थिति

स्थानीय लोगों का आरोप है कि एनएचएआई ने यूपी-बिहार के बीच मात्र 8 किलोमीटर की दूरी को लगभग 20 किलोमीटर लंबे मार्ग में बदलकर एक वैकल्पिक समाधान का भ्रम पैदा किया। यह कदम जनता के दबाव को कम करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

परियोजना को जानबूझकर कमजोर दिखाने का आरोप

सामने आ रही जानकारी के अनुसार, बगहा–बेलवनिया परियोजना को जानबूझकर कम उपयोगी बताकर केवल बाइक और कार मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे परियोजना को अव्यवहारिक दिखाकर ठंडे बस्ते में डालने की आशंका जताई जा रही है।

  • परियोजना को सीमित उपयोग वाला बताने का आरोप
  • महंगी और अव्यवहारिक योजना दिखाने की कोशिश
  • जनभावनाओं की अनदेखी का दावा

आंदोलन की राह पर जनता

संभावित निरस्तीकरण और देरी से आहत होकर अब स्थानीय समितियों और नागरिक समूहों ने धरना-प्रदर्शन और मशाल जुलूस जैसे आंदोलनों का रास्ता अपनाया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह संघर्ष किसी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि विकास के अधिकार के लिए है।

राजनीतिक चुप्पी पर उठे सवाल

इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा जनप्रतिनिधियों की चुप्पी को लेकर हो रही है। क्षेत्र के सांसदों और सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा ठोस पहल न किए जाने से जनता में निराशा बढ़ती जा रही है। केवल कुछ जनप्रतिनिधि ही इस मुद्दे को लगातार उठाते नजर आ रहे हैं।

तकनीकी बाधा या इच्छाशक्ति की कमी?

स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि क्या यह परियोजना वास्तव में तकनीकी कारणों से रुकी है, या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और प्रशासनिक टालमटोल का शिकार हो रही है। इस पर अब तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।

निष्कर्ष

गंडक पुल परियोजना अब विकास से कहीं आगे बढ़कर जवाबदेही और नेतृत्व की परीक्षा बन चुकी है। जनता को यह तय करना होगा कि कौन उनकी आवाज़ सुन रहा है, कौन चुप है, और कौन केवल समय काट रहा है। क्योंकि पुल केवल दो किनारों को नहीं जोड़ता, वह नीति और नेतृत्व की सच्चाई को भी उजागर करता है।

👉 पूर्वांचल और यूपी की बड़ी खबरों के लिए हमारे व्हाट्सएप्प चैनल को फॉलो करें – Web Varta

ये भी पढ़ें: कुशीनगर में मिले तीन कश्मीरी युवक: संदेह के बाद पुलिस जांच में निर्दोष पाए गए, पूछताछ के बाद छोड़े गए

Author

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img
spot_img

Latest

spot_img
spot_img

More articles

spot_img