Sunday, February 1, 2026
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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला छोड़ा: बिना स्नान दुखी मन से लौटे, अपमान पर कहा- औकात दिखानी होगी

प्रयागराज, अजय कुमार | वेब वार्ता

प्रयागराज के माघ मेले में विवाद के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 28 जनवरी 2026 को मेला बीच में छोड़ दिया। बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद वे काशी के लिए रवाना हो गए। उन्होंने कहा, “आज मन इतना व्यथित है कि बिना स्नान किए विदा ले रहा हूं। प्रयागराज हमेशा आस्था और शांति की धरती रही, लेकिन ऐसी घटना की कल्पना नहीं की थी। इस घटना ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया और न्याय, मानवता के प्रति विश्वास कमजोर कर दिया।” शंकराचार्य ने मौनी अमावस्या पर हुई घटना को अपमानजनक बताते हुए कहा कि प्रशासन के प्रस्ताव में माफी नहीं मांगी गई, इसलिए इसे ठुकरा दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि अपमान करने वालों को औकात दिखानी होगी और अन्याय के प्रतिकार में आगे आंदोलन होगा।

घटना का पूरा घटनाक्रम

18 जनवरी को माघ स्नान के लिए पालकी रोकी गई, जिस पर शिष्यों से धक्का-मुक्की हुई। शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि शिखा पकड़कर घसीटा गया। इसके बाद 11 दिनों से शिविर में प्रवेश नहीं किया। प्रशासन ने दो नोटिस जारी कर शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा, जिसका जवाब दिया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम ‘कालनेमि’ कहा, जिसकी तुलना शंकराचार्य ने औरंगजेब से की। संत समाज दो हिस्सों में बंटा, लेकिन तीनों शंकराचार्य समर्थन में रहे। बरेली सिटी मजिस्ट्रेट ने समर्थन में इस्तीफा दिया, जबकि अयोध्या डिप्टी कमिश्नर ने सीएम के पक्ष में इस्तीफा दिया।

माघ मेला 15 फरवरी तक चलेगा, जिसमें माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के स्नान बाकी हैं, लेकिन शंकराचार्य अब शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा, “मैंने मौन रखकर प्रार्थना की कि अपमान करने वालों को दंड मिले। मेरे सम्मान को ठेस पहुंचाई गई, इसके पीछे राज्य सरकार जिम्मेदार है।”

प्रशासनिक प्रस्ताव और शंकराचार्य की प्रतिक्रिया

माघ मेला प्रशासन ने पूरे सम्मान के साथ पालकी से संगम ले जाकर स्नान कराने और फूल बरसाने का प्रस्ताव भेजा, लेकिन शंकराचार्य ने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा, “दिल में दुख और गुस्सा हो तो पवित्र पानी भी शांति नहीं दे पाता।” मांग है कि मूल घटना की जिम्मेदारी लेकर दोषी माफी मांगें। शंकराचार्य ने कहा कि मुगलों के समय जैसा हो रहा है, 11 दिनों में प्रतिष्ठा की हत्या का प्रयास हुआ। युवाओं से अपील की कि सनातनी प्रतीकों का अपमान करने वालों को औकात दिखाएं।

उन्होंने कहा कि असली सम्मान तब होता जब गलती मानकर सच्चे मन से माफी मांगी जाती। माफी के बिना प्रस्ताव स्वीकार नहीं होगा।

  • घटना: 18 जनवरी को पालकी रोकी गई, शिष्यों से मारपीट का आरोप।
  • प्रस्ताव: पूरे सम्मान के साथ स्नान, फूल बरसाने का प्रस्ताव ठुकराया।
  • मांग: माफी और दोषियों पर कार्रवाई।
  • चेतावनी: आगे आंदोलन, युवाओं से अपील।

भविष्य की कार्रवाई और जनता के लिए संदेश

शंकराचार्य ने कहा कि अन्याय के प्रतिकार में आगे आंदोलन होगा। सनातनी समाज फैसला करेगा कि जीत किसकी हुई। जनता के लिए संदेश है कि संतों और शास्त्रों का सम्मान बनाए रखना आवश्यक है। अपमान का प्रतिकार शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ तरीके से किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद धार्मिक और प्रशासनिक संतुलन पर सवाल उठाता है।

भविष्य में ऐसे विवादों से बचने के लिए संवाद और सम्मान की जरूरत है।

निष्कर्ष

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का माघ मेला छोड़ना धार्मिक सम्मान और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है। यह घटना लोकतांत्रिक मूल्यों, धार्मिक सद्भाव और संवैधानिक न्याय की रक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करती है। अपमान का प्रतिकार शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ तरीके से होना चाहिए। समाज को एकजुट रहकर सनातन परंपराओं की रक्षा करनी होगी, ताकि आस्था और शांति की धरती प्रयागराज पर कोई कलंक न लगे।

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