नई दिल्ली, राष्ट्रीय डेस्क | वेब वार्ता
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जनवरी 2026 में अधिसूचित किए गए नए एंटी-डिस्क्रिमिनेशन रेगुलेशंस को लेकर देशभर में तीखी बहस छिड़ गई है। एक ओर जहां इन नियमों को उच्च शिक्षा संस्थानों में SC, ST और OBC छात्रों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सवर्ण समाज के कुछ वर्गों और छात्र संगठनों में इसे लेकर असंतोष और आशंका सामने आ रही है। कई विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलित हैं और सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और समर्थन
उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद भी खुलकर सामने आए हैं। आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चन्द्र शेखर आजाद, पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और निषाद पार्टी के अध्यक्ष एवं प्रदेश सरकार में मत्स्य मंत्री डॉ. संजय निषाद ने इन नए नियमों का समर्थन किया है। इन नेताओं का कहना है कि उच्च शिक्षा परिसरों में वंचित वर्गों के छात्रों के साथ भेदभाव की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं और नए नियम ऐसे मामलों में सुरक्षा तंत्र को मजबूत करेंगे।
विवाद की जड़: संसदीय समिति की भूमिका
इस पूरे विवाद के केंद्र में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, राज्यसभा सांसद और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति है। शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों से संबंधित इस समिति ने 8 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपी थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर ही UGC ने अपने प्रारंभिक ड्राफ्ट में कई संशोधन किए, जिन्हें जनवरी 2026 में अंतिम रूप देकर अधिसूचित किया गया।
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OBC को दायरे में लाने की सिफारिश
शुरुआती ड्राफ्ट में OBC वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया था। दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने इस पर आपत्ति जताते हुए सिफारिश की कि उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्गों के साथ होने वाले भेदभाव को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए, जितना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामलों में किया जाता है। इसके बाद अंतिम नियमों में OBC वर्ग को भी शामिल किया गया।
इक्विटी कमेटी का नया ढांचा
| प्रावधान | नई व्यवस्था | विवाद का कारण |
|---|---|---|
| इक्विटी कमेटी | SC/ST/OBC का 50% से अधिक प्रतिनिधित्व | जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल |
| शिकायत निपटान | कमेटी को अधिक अधिकार | निष्पक्षता को लेकर आशंका |
समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि संस्थानों में गठित इक्विटी कमेटी में SC, ST और OBC वर्गों के प्रतिनिधियों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए। इसका उद्देश्य यह बताया गया कि भेदभाव से जुड़े मामलों में पीड़ित वर्गों की आवाज को मजबूती से रखा जा सके। हालांकि, इसी बिंदु पर सवर्ण समाज के कुछ वर्गों ने आपत्ति जताई है और इसे एकतरफा व्यवस्था बताया है।
झूठी शिकायत पर जुर्माना हटने से बढ़ी चिंता
UGC के शुरुआती ड्राफ्ट में यह प्रावधान था कि यदि कोई शिकायत झूठी पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता पर जुर्माना लगाया जाएगा। संसदीय समिति ने इस प्रावधान को हटाने की सिफारिश की। समिति का तर्क था कि जुर्माने का डर वास्तविक पीड़ितों को शिकायत करने से रोक सकता है। इसके बाद अंतिम अधिसूचना में यह प्रावधान पूरी तरह हटा दिया गया।
इस बदलाव को लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों में यह चिंता जताई जा रही है कि इससे बिना ठोस आधार के शिकायतों की संभावना बढ़ सकती है और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है।
दिग्विजय सिंह का पक्ष और बयान
दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक सार्वजनिक बयान में कहा कि नए UGC दिशानिर्देश समानता की भाषा तो बोलते हैं, लेकिन उनकी संरचना में अस्पष्टता है। उनके अनुसार, भेदभाव की परिभाषा को बहुत व्यापक और अनिर्धारित रूप में रखने से न्याय के बजाय विवेकाधिकार हावी हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि झूठी शिकायतों पर दंड हटने से संस्थागत भरोसे और अकादमिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
सामाजिक न्याय बनाम अकादमिक संतुलन
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस केवल नियमों की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अकादमिक स्वतंत्रता के संतुलन की है। जहां एक पक्ष इसे ऐतिहासिक भेदभाव को दूर करने का प्रयास मानता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे अत्यधिक विवेकाधिकार और संभावित दुरुपयोग से जोड़कर देख रहा है।
निष्कर्ष
UGC के नए एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियमों ने उच्च शिक्षा को लेकर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की सिफारिशों से तैयार ये नियम अब राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक विमर्श के केंद्र में हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और UGC इन चिंताओं के समाधान के लिए कोई संशोधन या स्पष्टीकरण जारी करते हैं या नहीं।
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