लखनऊ/नई दिल्ली, अजय कुमार | वेब वार्ता
उत्तर प्रदेश विधान भवन, लखनऊ में आयोजित 86वाँ अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) 21 जनवरी 2026 को लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला के समापन भाषण के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर लोक सभा अध्यक्ष ने विधायिकाओं की भूमिका, लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षण और संसद की कार्यवाही की गरिमा पर अपने विचार रखे।
‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य में विधायिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण
लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने कहा कि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में देश की विधायिकाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विधायिकाओं को अधिक प्रभावी, जनोपयोगी और उत्तरदायी बनाने के लिए एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ (National Legislative Index) तैयार किया जाएगा, जिससे राज्यों की विधानसभाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और कार्यकुशलता को प्रोत्साहन मिलेगा।
राज्य विधानमंडलों में न्यूनतम 30 बैठकें अनिवार्य हों
श्री बिरला ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है कि राज्य विधानमंडल प्रति वर्ष कम से कम 30 बैठकें करें। उन्होंने कहा कि सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही सार्थक और परिणामोन्मुख चर्चा संभव होगी, जिससे जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिलेगी।
- विधायिकाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए बनेगा ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’।
- राज्य विधानमंडलों में प्रति वर्ष न्यूनतम 30 बैठकें सुनिश्चित करने का प्रस्ताव।
- लोकतंत्र में संवाद, चर्चा और सहयोग की संस्कृति को सुदृढ़ करने पर बल।
‘Disruption नहीं, Discussion और Dialogue की संस्कृति को बढ़ाएं’
आगामी बजट सत्र को लेकर मीडिया से बातचीत में लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि नियोजित गतिरोध और व्यवधान लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं। उन्होंने कहा, “जब सदन में व्यवधान होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उस नागरिक का होता है जिसकी समस्या पर चर्चा होनी थी।” उन्होंने सभी दलों के नेताओं और सांसदों से अपील की कि वे सदन को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग दें।
लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षक हैं पीठासीन अधिकारी
श्री बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारी केवल सदन की कार्यवाही संचालित करने वाले नहीं, बल्कि वे संविधान के प्रहरी और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षक हैं। उनकी निष्पक्षता और संवेदनशीलता ही सदन की दिशा निर्धारित करती है। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए पीठासीन अधिकारियों से जिम्मेदारीपूर्वक कार्य करने का आह्वान किया।
सम्मेलन में पारित हुए छह महत्वपूर्ण संकल्प
तीन दिवसीय सम्मेलन में कुल छह प्रमुख संकल्प पारित किए गए, जिनमें विधायिकाओं की कार्यकुशलता, तकनीकी सुदृढ़ता और जनता के प्रति उत्तरदायित्व को बढ़ाने पर बल दिया गया:
- विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में विधायिकाओं की सक्रिय भागीदारी।
- राज्य विधानमंडलों में प्रति वर्ष न्यूनतम 30 बैठकें अनिवार्य।
- विधायी कार्यों की सुगमता हेतु प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा।
- सहभागी शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करना।
- विधायकों की क्षमता निर्माण और अनुसंधान समर्थन को बढ़ाना।
- ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ के माध्यम से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना।
सम्मेलन में शामिल हुए देशभर के पीठासीन अधिकारी
सम्मेलन में 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कुल 36 पीठासीन अधिकारियों ने भाग लिया। यह सहभागिता की दृष्टि से अब तक का सबसे बड़ा सम्मेलन रहा। तीन दिनों तक आयोजित सत्रों में पारदर्शी विधायी प्रक्रियाओं, क्षमता निर्माण और जनता के प्रति जवाबदेही जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
निष्कर्ष: लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक पहल
लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन जैसे मंच लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच समन्वय और सहयोग को बढ़ाते हैं। यह सम्मेलन भारतीय संसदीय लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ है।
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