जयपुर, ब्यूरो | वेब वार्ता
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर: जयपुर में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के पहले दिन भाषा और संस्कृति को लेकर एक अहम बहस देखने को मिली। प्रख्यात लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने ‘इंडिया इन उर्दू, उर्दू इन इंडिया’ विषय पर आयोजित सत्र में स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषाओं का धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्होंने उर्दू को एक पूरी तरह सेक्युलर भाषा बताते हुए कहा कि भाषा को धार्मिक चश्मे से देखना समाज को बांटने का काम करता है।
उर्दू को लेकर चल रहे विवाद पर जावेद अख्तर की दो टूक
जावेद अख्तर ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाषा को लेकर बार-बार विवाद खड़े किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि भाषाएं संवाद और समझ के लिए होती हैं, न कि किसी धर्म विशेष की पहचान के लिए। उनके अनुसार, माता-पिता यदि बच्चों को धर्म के बारे में अधिक समय देने के बजाय भाषा सिखाने पर ध्यान दें, तो समाज अधिक समझदार और सहिष्णु बन सकता है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के एक पुराने संदर्भ का जिक्र करते हुए कहा कि उर्दू शब्दों के प्रयोग को कम करने की सलाह देना अनावश्यक था।
‘लैंग्वेज रीजन की होती है, रिलीजन की नहीं’
अपने संबोधन में जावेद अख्तर ने जोर देकर कहा कि भाषा क्षेत्र की होती है, धर्म की नहीं। उन्होंने कहा कि न तो उर्दू किसी धर्म की भाषा है और न ही संस्कृत। ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि एक समय हिंदुस्तानी भाषा पूरे देश को जोड़ने वाली कड़ी थी, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों की बोलियों का सहज मिश्रण था। यह भाषा अपनापन पैदा करती थी, लेकिन आज दिखावे और विवादों के कारण यह धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है।
- भाषाओं का धर्म से कोई संबंध नहीं होता
- उर्दू और संस्कृत की तुलना तर्कसंगत नहीं
- हिंदुस्तानी भाषा ने लंबे समय तक देश को जोड़े रखा
उर्दू, संस्कृत और तमिल पर विचार
जावेद अख्तर ने कहा कि संस्कृत हजारों वर्ष पुरानी भाषा है, जबकि उर्दू अपेक्षाकृत नई है, इसलिए दोनों की आपस में तुलना नहीं की जा सकती। उन्होंने तमिल को सबसे जिंदादिल भाषा बताते हुए कहा कि वह आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवंत है। उन्होंने यह भी कहा कि उर्दू भाषा के कारण ही एक समय देश का बंटवारा हुआ, और आज भी उर्दू को अपनी भाषा मानने वाले कई लोगों को मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
हिंदी शब्दकोश को समृद्ध करने की जरूरत
सत्र के दौरान उन्होंने हिंदी भाषा के भविष्य पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के शब्दकोश में हर साल नए शब्द जुड़ते हैं और इसे गर्व की बात माना जाता है, जबकि हिंदी में कई बार शब्द कम हो जाते हैं और हम इसे खुशी से स्वीकार कर लेते हैं। उनके अनुसार, हिंदी को समृद्ध और समावेशी बनाने की जरूरत है, ताकि वह आम लोगों की सहज अभिव्यक्ति का माध्यम बनी रहे।
निष्कर्ष: भाषा को जोड़ने का माध्यम बनाना होगा
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच से जावेद अख्तर का यह संदेश साफ था कि भाषा को विभाजन नहीं, बल्कि संवाद और समझ का माध्यम बनना चाहिए। उन्होंने भाषाई विविधता को भारत की ताकत बताते हुए कहा कि जब भाषा सहज होगी, तभी समाज भी अधिक समरस और मजबूत बनेगा।
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