Sunday, January 18, 2026
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संभल हिंसा: सीजेएम कोर्ट ने पूर्व सीओ अनुज चौधरी समेत पुलिसकर्मियों पर FIR के आदेश दिए, अमल से पुलिस का इनकार

संभल | वेब वार्ता

संभल हिंसा: उत्तर प्रदेश के संभल जिले में पिछले वर्ष 24 नवंबर को शाही जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़े मामले में चंदौसी स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कोर्ट ने तत्कालीन सर्किल ऑफिसर (CO) अनुज चौधरी सहित कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। इसके बावजूद पुलिस प्रशासन ने अब तक इस आदेश पर अमल नहीं किया है, जिससे न्यायिक आदेशों के अनुपालन और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

संभल के सीजेएम न्यायालय ने एक स्थानीय युवक आलम के पिता की याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश पारित किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि 24 नवंबर को हुई हिंसा के दौरान पुलिस फायरिंग में आलम गंभीर रूप से घायल हुआ था।
कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्टों के अवलोकन के बाद तत्कालीन CO अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाल अनुज तोमर और 12 से 20 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया।

पुलिस क्यों नहीं दर्ज कर रही एफआईआर?

कोर्ट के आदेश के बाद संभल पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया कि वह इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेगा। पुलिस का कहना है कि इस मामले में पहले से ही न्यायिक जांच हो चुकी है, इसलिए नई एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर पुलिस ने फिलहाल एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया है।

कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी निचली अदालत ने स्पष्ट रूप से एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है, तो पुलिस को पहले उसका अनुपालन करना चाहिए। आदेश के खिलाफ अपील करना कानूनी अधिकार है, लेकिन अनुपालन से इनकार करना न्यायिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में पुलिस का रुख न्याय व्यवस्था में आम जनता के भरोसे को कमजोर कर सकता है।

मामले का सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भ

यह मामला केवल एक एफआईआर तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि हिंसा के दौरान घायल हुए व्यक्ति को न तो समय पर न्याय मिला और न ही उचित जांच हुई। एफआईआर दर्ज न होने से पीड़ित पक्ष में नाराजगी और असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

निष्कर्ष: कानून के शासन की कसौटी

संभल का यह मामला न्यायपालिका और पुलिस प्रशासन के बीच संतुलन और संवैधानिक दायित्वों की एक अहम परीक्षा बन गया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पुलिस उच्च न्यायालय में क्या रुख अपनाती है और क्या सीजेएम कोर्ट के आदेश पर अंततः अमल होता है या नहीं।

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