Thursday, January 15, 2026
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बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘केवल RT-PCR नेगेटिव रिपोर्ट आधार नहीं’, कोरोना से जान गंवाने वाली नर्स के परिवार को मिला 50 लाख मुआवजा

मुंबई, विशेष संवाददाता | वेब वार्ता 

कोरोना महामारी के दौरान जान गंवाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के परिवारों के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक राहत भरा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि केवल RT-PCR रिपोर्ट नेगेटिव होने के आधार पर कोरोना से मौत का मुआवजा खारिज नहीं किया जा सकता। अगर अन्य मेडिकल रिपोर्ट्स, सीटी स्कैन, ऑक्सीजन लेवल, मृत्यु प्रमाण पत्र और अस्पताल रिकॉर्ड साफ तौर पर संक्रमण और उससे हुई मौत की पुष्टि करते हैं, तो मुआवजा देना अनिवार्य है।

यह फैसला एटा की रहने वाली नर्स माचिंद्र गायकवाड़ के पति द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया। माचिंद्र गायकवाड़ 1993 से अहिल्यानगर सिविल अस्पताल में नर्स के पद पर तैनात थीं। मई 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ड्यूटी के समय उनकी तबीयत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई। गायकवाड़ ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 50 लाख रुपये के बीमा मुआवजे के लिए आवेदन किया था।

जिला प्रशासन ने क्यों खारिज किया दावा?

जिला प्रशासन ने दावा इस आधार पर खारिज कर दिया था कि मृत नर्स की RT-PCR रिपोर्ट नेगेटिव थी और पॉजिटिव रिपोर्ट जमा नहीं की गई। लेकिन हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (न्यायमूर्ति अरुण पेडनेकर और न्यायमूर्ति वैषाली जाधव) ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि RT-PCR रिपोर्ट को एकमात्र आधार मानना गलत है। अदालत ने माना कि कई मामलों में RT-PCR रिपोर्ट गलत (फॉल्स नेगेटिव) आ सकती है, इसलिए अन्य मेडिकल सबूतों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने निम्नलिखित सबूतों पर जोर दिया:

  • सीटी स्कैन रिपोर्ट: कोरोना संक्रमण की पुष्टि।
  • ऑक्सीजन लेवल: गंभीर कमी।
  • अस्पताल रिकॉर्ड: क्वारंटीन सेंटर में तैनाती और मरीजों के संपर्क में रहना।
  • मृत्यु प्रमाण पत्र: मौत का कारण कोरोना से संबंधित।

कोर्ट का सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे गायकवाड़ का दावा आगे संबंधित विभाग को भेजें और यह मानकर चलें कि उनकी पत्नी की मौत कोरोना संक्रमण से हुई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि तकनीकी आधार पर मुआवजा रोकना अन्याय है।

यह फैसला उन हजारों स्वास्थ्यकर्मियों के परिवारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिनके मुआवजे केवल RT-PCR रिपोर्ट नेगेटिव होने के कारण रोके गए थे। महामारी के दौरान फ्रंटलाइन पर तैनात डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों ने जान जोखिम में डालकर सेवा की थी। कई मामलों में RT-PCR रिपोर्ट समय पर नहीं आई या नेगेटिव आई, लेकिन मौत स्पष्ट रूप से कोरोना से हुई थी।

फैसले का व्यापक असर

  • स्वास्थ्यकर्मियों के परिवारों के लिए राहत: अब तकनीकी आधार पर मुआवजा खारिज नहीं होगा।
  • अन्य राज्यों के लिए मिसाल: बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला अन्य हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में भी संदर्भ के रूप में इस्तेमाल हो सकता है।
  • नीतिगत बदलाव की उम्मीद: केंद्र और राज्य सरकारों को अब मुआवजा दावों की जांच में RT-PCR के अलावा अन्य मेडिकल सबूतों को भी प्राथमिकता देनी होगी।

कोर्ट ने इस फैसले से स्पष्ट संदेश दिया है कि कोरोना काल में जान गंवाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के परिवारों के साथ अन्याय नहीं होगा। यह फैसला महामारी के दौरान फ्रंटलाइन पर डटे योद्धाओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक है।

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