देवरिया, ममता तिवारी | वेब वार्ता
देवरिया में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रोफेसर विमलेश मिश्र ने हिंदी की वर्तमान स्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज हिंदी को राजनेता राष्ट्रभाषा मानते ही नहीं हैं और अंग्रेजी ही शासक की भाषा बन चुकी है। नागरी प्रचारिणी सभा के तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में प्रो. मिश्र मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
प्रो. विमलेश मिश्र का संबोधन: हिंदी की स्थिति चिंताजनक
प्रो. विमलेश मिश्र ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के पूर्व राजनेता और साहित्यकार जन जागरण के लिए हिंदी को ही उपयुक्त समझते थे, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल गई है। उन्होंने कहा, “आज हिंदी को राजनेता राष्ट्रभाषा मानते ही नहीं हैं। अंग्रेजी ही शासक की भाषा बन चुकी है। विश्व में जो हिंदी दिख रही है, वह बाजार की आवश्यकता के कारण है, उससे संस्कृति का बोध नहीं होता। आज हिंदी की स्थिति देखनी हो तो अपने घर के बच्चों को देखिए। वास्तव में अंग्रेजी से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उसके समानांतर पुस्तकें लिखनी पड़ेंगी। तभी हिंदी अंग्रेजी का स्थान ले सकेगी। आज के तकनीकी चुनौतियों को स्वीकार करके ही हिंदी विश्व स्तर पर स्थापित हो सकेगी।”
डॉ. अभिषेक मिश्र: भाषा में ही मूल्य बोध है
डॉ. अभिषेक मिश्र ने कहा कि भाषा में ही हमें बोध होता है, मूल्य बोध होता है। जिस देश में अस्मिता बोध होगा, उसकी भाषा जीवंत और दीर्घकालिक होगी। उन्होंने कहा कि भाषा से अलगाव सांस्कृतिक मूल्यों का भूल जाना है। ऐसा अंग्रेजी के प्रभाव से हो रहा है। हमें इससे बचना चाहिए और अपने मूल्यों को सुरक्षित रखना चाहिए, तभी हिंदी का विकास होता रहेगा।
नागरी प्रचारिणी सभा के योगदान की सराहना
नागरी प्रचारिणी सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इंद्र कुमार दीक्षित ने हिंदी के विकास में सभा के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सभा का पुस्तकालय स्वयं इसका प्रमाण है। ब्रिटिश हुकूमत में सभा के पदाधिकारियों ने फारसी की जगह हिंदी में आवेदन देते थे और हिंदी के प्रयोग पर बल देते थे।
डॉ. शकुंतला दीक्षित ने कहा कि आज नई पीढ़ी हिंदी के प्रति उदासीन है। वे अंग्रेजियत को ही तरजीह देने लगे हैं, यह चिंता का विषय है।
अध्यक्ष डॉ. जयनाथ मणि त्रिपाठी का संबोधन
नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष डॉ. जयनाथ मणि त्रिपाठी ने कहा कि 1950 में संविधान में राज्य भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार किए जाने के बाद 15 वर्ष का समय सरकार ने हिंदी सीखने के लिए निर्धारित किया, जो आज तक बना हुआ है। तब से ही संघर्ष के रूप में हम हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस का आयोजन करते हैं।
कार्यक्रम का महत्व और उपस्थिति
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षक, छात्र और समाजसेवी उपस्थित रहे। यह आयोजन हिंदी के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उसकी स्थिति पर गंभीर चिंतन करने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ।
प्रमुख बिंदु एक नजर में
| वक्ता | मुख्य बातें |
|---|---|
| प्रो. विमलेश मिश्र | हिंदी को राजनेता राष्ट्रभाषा नहीं मानते, अंग्रेजी शासक भाषा बनी |
| डॉ. अभिषेक मिश्र | भाषा में मूल्य बोध, अंग्रेजी प्रभाव से बचना जरूरी |
| इंद्र कुमार दीक्षित | नागरी प्रचारिणी सभा का ऐतिहासिक योगदान |
| डॉ. शकुंतला दीक्षित | नई पीढ़ी हिंदी के प्रति उदासीन, चिंता का विषय |
| डॉ. जयनाथ मणि त्रिपाठी | 1950 से हिंदी संघर्ष जारी, 15 वर्ष की समयसीमा आज भी बरकरार |
विश्व हिन्दी दिवस पर आयोजित यह समारोह हिंदी की वर्तमान स्थिति पर गंभीर चिंतन का मंच बना। प्रो. विमलेश मिश्र जैसे विद्वानों के विचारों ने स्पष्ट किया कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने के लिए राजनेताओं, समाज और युवा पीढ़ी को एकजुट होना होगा। अंग्रेजी के प्रभाव को कम करने के लिए तकनीकी क्षेत्र में हिंदी को मजबूत करना और बाजार की भाषा के साथ-साथ संस्कृति की भाषा बनाना जरूरी है। नागरी प्रचारिणी सभा जैसे संगठनों के प्रयास सराहनीय हैं। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए आज से ही ठोस कदम उठाने होंगे।




