लखनऊ, अजय कुमार | वेब वार्ता
क्या आपने कभी सोचा था कि मतदाता सूची की एक साधारण सफाई पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति को हिला कर रख देगी? विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की ड्राफ्ट लिस्ट ने ठीक यही कर दिखाया है। पहले 15.44 करोड़ वोटर थे, अब 2.89 करोड़ नाम कटने के बाद सिर्फ 12.55 करोड़ बचे हैं। सवाल उठता है – ये नाम कहां गए? और सबसे बड़ा सवाल – इसका फायदा किसे और नुकसान किसे होगा? चलिए, जरा गहराई में उतरकर देखते हैं, क्योंकि यह खेल अभी शुरू ही हुआ है!
शहरी वोटरों का पलायन: भाजपा के गढ़ में सेंध?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा कटौती शहरों में हुई है। लखनऊ में तो पूरे 30% नाम गायब – यानी करीब 12 लाख वोटर! गाजियाबाद में 28%, प्रयागराज में 24%, कानपुर, नोएडा, वाराणसी में भी भारी कमी। ये वही इलाके हैं जहां भाजपा का मजबूत मध्यवर्गीय, व्यापारी और नौकरीपेशा वोट बैंक माना जाता रहा है।
क्या हुआ होगा? ज्यादातर लोग अपने पैतृक गांवों की ओर शिफ्ट हो गए। शहर में रहते हैं, लेकिन वोट गांव में डालना चाहते हैं। नतीजा? शहरी विधानसभा और लोकसभा सीटों पर भाजपा का वोट बेस कमजोर पड़ सकता है। अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, गोरखपुर जैसे धार्मिक महत्व के जिलों में भी 17-19% कटौती हुई है – जहां भाजपा का दबदबा रहा है। क्या यह चेतावनी की घंटी है?
ग्रामीण इलाकों में नया संतुलन: सपा मुस्कुरा रही?
अब नजर दौड़ाएं गांवों और कस्बों पर। यहां वोटरों की संख्या में संतुलन बढ़ा है। सपा का तो पारंपरिक गढ़ ही यही है – किसान, स्थानीय मतदाता, छोटे कस्बे। अगर शहरों से कटे वोटर गांवों में जुड़ रहे हैं, तो यह अखिलेश यादव के लिए अच्छी खबर हो सकती है। खासकर पूर्वांचल और मध्य यूपी में सपा को फायदा मिलने की चर्चा है। क्या यह पलड़ा सपा की ओर झुकने का संकेत है?
बसपा की स्थिति थोड़ी अलग है। उसका कोर वोटर शहरी-ग्रामीण दोनों में फैला है। डुप्लीकेट और फर्जी नाम हटने से सूची शुद्ध हुई है – अगर मायावती का संगठन जाग जाए, तो बसपा को स्थिर लाभ मिल सकता है। सवाल यह है – क्या बसपा इस मौके को भुना पाएगी?
मुस्लिम बहुल जिलों में क्या हुआ?
सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, रामपुर, संभल जैसे जिलों में 15-18% कटौती हुई है। यहां मुस्लिम मतदाता 40-50% हैं और सपा गठबंधन को पहले से बढ़त मिली हुई है। क्या यह कटौती सपा के लिए और मजबूती लाएगी, या दावा-आपत्ति के बाद सब बदल जाएगा?
प्रमुख जिलों में कटौती: आंकड़े बोल रहे हैं
| जिला | कटौती प्रतिशत | पहले मतदाता (लाख में) | अब मतदाता (लाख में) | संभावित असर |
|---|---|---|---|---|
| लखनऊ | 30% | 39.94 | 27.94 | भाजपा को नुकसान? |
| गाजियाबाद | 28% | ~28 | ~20 | शहरी सीटों पर प्रभाव |
| प्रयागराज | 24% | 46.92 | 35.36 | मिश्रित असर |
| वाराणसी | 18% | – | – | भाजपा गढ़ में सेंध? |
| अयोध्या | 17.69% | – | – | धार्मिक सीटों पर नजर |
अभी खेल बाकी है…
सबसे रोचक बात – यह सिर्फ ड्राफ्ट है! 6 फरवरी तक दावे-आपत्तियां दर्ज हो सकती हैं। कितने वोटर वापस जुड़ेंगे? पार्टियां कितने प्रभावी ढंग से अपने समर्थकों को mobilize करेंगी? अंतिम लिस्ट 6 मार्च को आएगी – तब असली तस्वीर साफ होगी।
चुनाव आयोग की यह सफाई लोकतंत्र को मजबूत बना रही है, लेकिन सियासी दलों के लिए यह बड़ा इम्तिहान है। कौन इस बदलाव को अपने पक्ष में मोड़ेगा? अगले कुछ महीने बेहद दिलचस्प होने वाले हैं। आप क्या सोचते हैं – यह कटौती किसकी सियासी किस्मत बदलेगी?








