विधेयकों को मंजूरी: सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति मुर्मू के 14 सवालों की पड़ताल पर सहमत

नई दिल्ली, (वेब वार्ता)। उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने आठ अप्रैल के अपने फैसले के संबंध में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा उठाए गए 14 महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार-विमर्श करने पर मंगलवार को सहमति व्यक्त की।

शीर्ष अदालत के आठ अप्रैल के फैसले में राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए कार्रवाई करने की समय-सीमा तय की गई थी।

प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर की संविधान पीठ 29 जुलाई को समय-सीमा तय करेगी और अगस्त के मध्य में राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई शुरू करेगी।

राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 (1) का विरले ही प्रयोग देखने को मिलता है। इस अनुच्छेद के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि निम्नलिखित कानूनी प्रश्न उठे हैं और वे ऐसी प्रकृति और सार्वजनिक महत्व के हैं कि उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है।

संविधान का अनुच्छेद 143 (1) राष्ट्रपति की सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति से संबंधित है।

President invokes article 143 to Supreme Court

अनुच्छेद के अनुसार, ”अगर किसी भी समय राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत हो कि विधि या तथ्य का कोई प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है जो ऐसी प्रकृति और ऐसे सार्वजनिक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो राष्ट्रपति उस प्रश्न को विचार के लिए उच्चतम न्यायालय भेज सकते हैं और न्यायालय ऐसी सुनवाई के बाद जैसा वह उचित समझे, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय से अवगत करा सकता है।”

राष्ट्रपति के प्रश्न निम्नलिखित हैं:

* जब राज्यपाल के समक्ष कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत उनके समक्ष संवैधानिक विकल्प क्या हैं?

* क्या राज्यपाल के समक्ष कोई विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत अपने पास उपलब्ध सभी विकल्पों का प्रयोग करते समय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बाध्य है?

* क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा संवैधानिक विवेक का प्रयोग न्यायोचित है?

* क्या भारतीय संविधान का अनुच्छेद 361, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कार्यों के संबंध में न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है?

* संवैधानिक रूप से निर्धारित समय-सीमा और राज्यपाल द्वारा शक्तियों के प्रयोग के तरीके के अभाव में क्या राज्यपाल द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत सभी शक्तियों के प्रयोग के लिए न्यायिक आदेशों के माध्यम से समयसीमा निर्धारित की जा सकती है और प्रयोग का तरीका निर्धारित किया जा सकता है?

* क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक विवेकाधिकार का प्रयोग न्यायोचित है?

* राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों के प्रयोग के लिए संवैधानिक रूप से निर्धारित समय-सीमा और तरीके के अभाव में क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के प्रयोग के लिए न्यायिक आदेशों के माध्यम से समयसीमा निर्धारित की जा सकती है और प्रयोग का तरीका निर्धारित किया जा सकता है?

* राष्ट्रपति की शक्तियों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक योजना के प्रकाश में, क्या राष्ट्रपति को भारत के संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत संदर्भ के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने और राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की सहमति के लिए या अन्यथा किसी विधेयक को आरक्षित करने पर सर्वोच्च न्यायालय की राय लेने की आवश्यकता है?

* क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय, कानून के लागू होने से पहले के चरण में न्यायोचित हो सकते हैं? क्या न्यायालयों के लिए किसी विधेयक के कानून बनने से पहले किसी भी रूप में उसकी विषय-वस्तु पर न्यायिक निर्णय लेना जायज है?

* क्या संवैधानिक शक्तियों के प्रयोग और राष्ट्रपति/राज्यपाल के आदेशों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत किसी भी प्रकार से प्रतिस्थापित किया जा सकता है?

* क्या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की स्वीकृति के बिना लागू कानून है?

* भारतीय संविधान के अनुच्छेद 145(3) के प्रावधान के मद्देनजर क्या इस न्यायालय की किसी भी पीठ के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह पहले यह तय करे कि उसके समक्ष कार्यवाही में शामिल प्रश्न ऐसी प्रकृति का है जिसमें संविधान की व्याख्या के रूप में कानून के पर्याप्त प्रश्न शामिल हैं और इसे कम से कम पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को संदर्भित करे?

*…(क्या) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय की शक्तियां प्रक्रियात्मक कानून के मामलों तक सीमित हैं या भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 ऐसे निर्देश जारी करने/आदेश पारित करने तक विस्तारित है जो संविधान या लागू कानून के मौजूदा मूल या प्रक्रियात्मक प्रावधानों के विपरीत या असंगत हैं?

* क्या संविधान, भारत के संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत मुकदमे के अलावा, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के किसी अन्य अधिकार क्षेत्र को प्रतिबंधित करता है?

राष्ट्रपति का यह निर्णय आठ अप्रैल को उच्चतम न्यायालय के उस फैसले के संदर्भ में आया है जिसमें न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल की शक्तियों को लेकर उठाए गए सवाल पर निर्णय दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने पहली बार यह निर्धारित किया कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ रखे गए विधेयकों पर ऐसा संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने के भीतर निर्णय लिया जाना चाहिए।

पांच पृष्ठों के संदर्भ में राष्ट्रपति मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से प्रश्न पूछे और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने में अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपालों एवं राष्ट्रपति की शक्तियों के संबंध में उसकी राय जानने का प्रयास किया।

अनुच्छेद 200 राज्य विधानसभा द्वारा विधेयकों के पारित होने और उसके बाद राज्यपाल के पास अनुमति देने, अनुमति नहीं देने या विधेयक को राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के लिए भेजने के उपलब्ध विकल्पों से संबंधित स्थितियों का वर्णन करता है।

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि राज्यपाल के व्यक्तिगत असंतोष, राजनीतिक औचित्य या किसी अन्य असंगत या अप्रासंगिक विचार जैसे आधारों पर विधेयक को सुरक्षित रखना संविधान द्वारा पूरी तरह से अस्वीकार्य है और केवल इसी आधार पर इसे तत्काल रद्द किया जा सकता है।

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