Wednesday, February 11, 2026
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“राम राज्य” के दावों पर भारी अराजकता: एएसआई की आत्महत्या ने खोली बीजेपी शासन की कानून व्यवस्था की पोल— रघु ठाकुर

भोपाल/दतिया, मुकेश शर्मा (वेब वार्ता)। मध्य प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर उठते सवाल एक बार फिर उभरकर सामने आ गए हैं, जब दतिया जिले में तैनात एक ईमानदार एएसआई प्रमोद पावन ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले रिकॉर्ड किए गए वीडियो में उन्होंने पुलिस तंत्र में फैले भ्रष्टाचार, माफिया-प्रशासन की मिलीभगत और लगातार मिल रही धमकियों का खुलासा किया है। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संरक्षक रघु ठाकुर ने इस घटना को “रामराज्य” नहीं बल्कि “माफियाराज” करार दिया है और दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

घटना का विवरण

दतिया जिले के गोरधन थाने में पदस्थ सहायक उपनिरीक्षक (एएसआई) प्रमोद पावन ने रविवार को आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले उन्होंने एक वीडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि थानाप्रभारी और एक आरक्षक उन्हें रेत और जुए के अवैध कारोबार पर कार्यवाही से रोकते थे। उन्हें माफियाओं से जान से मरवा देने की धमकी दी जा रही थी।

“मैं ईमानदारी से काम करना चाहता था, लेकिन मुझे रोका गया। मेरी मौत का जिम्मेदार सिस्टम है।”एएसआई प्रमोद पावन, आत्महत्या से पहले रिकॉर्डेड वीडियो में

राजनीतिक प्रतिक्रिया और तीखा हमला

लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संरक्षक रघु ठाकुर ने इस घटना को “माफियाराज का प्रतीक” बताया। उन्होंने भाजपा के बहुचर्चित “रामराज्य” मॉडल की तीखी आलोचना करते हुए कहा—

“दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज्य काहू न व्यापा”,
लेकिन मध्यप्रदेश में आज उलट हो गया है—
“ताप ही तापा, नहीं बचा कोई, जेहूं नहीं व्यापा।”

उन्होंने कहा कि जब एक पुलिस अधिकारी असुरक्षित महसूस करता है और आत्महत्या करता है, तो आम जनता की सुरक्षा की क्या उम्मीद की जाए? उन्होंने सरकार से प्रमोद पावन की आत्महत्या की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच और दोषियों पर धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की।

प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल

  • क्या माफिया और अपराधियों को प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है?

  • पुलिसकर्मी तक अगर सुरक्षित नहीं हैं, तो आमजन की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?

  • क्या “रामराज्य” का दावा केवल प्रचार भर है?

समाप्ति टिप्पणी

यह घटना केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि एक सिस्टम की हार है। अगर जनता चुप रही, तो कल कोई और प्रमोद पावन होगा।
अब समय आ गया है कि समाज के सजग नागरिक, बुद्धिजीवी और युवा इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाएं।

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